Saturday, 6 August 2011

कमजोर चंद्रमा : असाधारण व्‍यक्तित्‍व

पिछले आलेख में मैने बताया कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में सूर्य से 40 डिग्री की दूरी तक के चांद को कमजोर कहा जाता है , यह मन का प्रतीक ग्रह है , इसलिए इसके कमजोर होने से व्‍यक्ति बाल्‍यावस्‍था के वातावरण में या पालन पोषण में किसी प्रकार की कमी को मन ही मन महसूस करता है । इस कमजोरी को दूर करने के लिए असाधारण कार्य करना चाहता है। यदि अन्‍य ग्रह इसका साथ दें तो वह इस असाधारण कार्य का फल प्राप्‍त करके असाधारण व्‍यक्तित्‍व का स्‍वामी बन जाता है। इस प्रकार किसी के व्‍यक्तित्‍व निर्माण में छोटे चंद्रमा की भी भूमिका होती है। इसलिए कमजोर चंद्रमा के कारण बच्‍चे का व्‍यवहार कुछ असामान्‍य हो , तो अधिक चिंता करने की आवश्‍यकता नहीं। नीचे के उदाहरण से इस बात को स्‍पष्‍ट किया जा सकता है ......

झांसी की महारानी लख्मीबाई का जन्म संवत्1891 में कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष कह चतुर्दशी तिथि को तुला लग्न में हुआ था। इनका चंद्रमा दशम भावाधिपति कमजोर होकर लग्न में स्थित है , इसलिए उन्होनें बाल्यावस्था में शरीर और पिता के सुख में कमी का अहसास किया और इसकी क्षतिपूर्ति के लिए ऐसा असाधारण कार्य कर बैठी कि पूरी दुनिया उनके व्यक्तित्व का लोहा मानती है और प्रतिष्ठा देती है।

महात्मा गांधी का जन्म 02.10.1869 को तुला लग्न में ही हुआ था , चंद्रमा दशम भावाधिपति एकादश भाव में स्थित है , इस कारण बचपन में लाभ और प्रतिष्ठा की कमी महसूस की आर ऐसा असाधारण कार्य कर डाला कि पूरी दुनिया इनके लाभ प्राप्ति के तरीके की इज्जत करती है।

पं रविन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 07.05.1861 में मीन लग्न में हुआ था , कमजोर चंद्रमा बुद्धि का अधिपति लग्न में स्थित है , इसलिए बाल्यावस्था की शारीरिक और बौद्धिक कमजोरी को दूर करने के लिए बाद में असाधारण पुस्तकें लिखकर असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बन गए।

हैदर अली शाह ने दिसम्बर 1772 में तुला लग्न और वृश्चिक राशि में जन्म लिया था , यानि कमजोर चंद्रमा दशम भावाधिपति द्वितीय भाव में स्थित था। इन्होनें बाल्यावस्था में पिता , प्रतिष्ठा और धन तीनों की कमी को महसूस किया और बाद के जीवन में तीनों को ही मजबूती दे सकें।

श्री आदि शंकराचार्य ने कर्क लग्न में जन्म लिया था , इनका लग्नाधिपति कमजोर चंद्रमा लाभ स्थान में स्थित था , जिसके कारण बाल्यावस्था में शारीरिक कष्ट और लाभ की कमी को महसूस किया और बाद में शरीर लाभ का असाधारण कार्य कर बैठे।

स्वर्गीय देवकी नारायण खत्रीजी का जन्म संवत् 1924 पौष कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मिथुन लग्न में हुआ था , द्वितीय भावाधिपति चंद्रमा कमजोर होकर षष्ठ भाव में स्थित है, जिसके कारण इन्होनें बाल्यावस्था में झंझटों , पेचीदगियों जैसी समस्याओं के कारण आर्थिक कमजोरी महसूस की और बाद में अनेक जासूसी और तिलिस्मी उपन्यास लिखे , जिनसे उन्हें आर्थिक लाभ हुआ।

रामकृष्ण परमहंसजी का जन्म 18.02.1836 को कुंभ लग्न में हुआ था , इनका षष्ठ भावाधिपति चंद्रमा कमजोर होकर लग्न में स्थित है , जिसके कारण बाल्यावस्था में इन्होनें शारीरिक और अन्य जटिलताओं को महसूस किया और बाद में मोक्ष की प्राप्ति हेतु असाधारण कार्य कर बैठे।

मथुरा के प्रसिद्ध सुख संचारक कंपनी के मालिक पं क्षेत्रपाल शर्माजी ने कुंभ लग्न और मकर राशि के अंतर्गत जन्म लिया था , षष्ठ भावाधिपति चंद्रमा द्वादश भाव में स्थित था , जिसके कारण बाल्यावस्था में रोगों की उपस्थिति और क्रयशक्ति की कमजोरी का अनुभव किया और बाद में विश्व स्तर पर लोकप्रिय होनेवाली असाधारण दवाइयां निकाली।

भगवान रजनीश का जन्म 11.12.1931 को कुंभ लग्न में हुआ था , इनका भी षष्ठ भावाधिपति चंद्रमा एकादश भाव में स्थित है , इस कारण बाल्यावस्था में अनेक प्रकार के झंझटों के कारण लाभप्राप्ति के लिए अपने को कमजोर पाया और बाद में लाभप्राप्ति के अनोखे मार्ग को चुना तथा असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बनें।

फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन का जन्म 10.10.1942 को मीन लग्न मे हुआ था , पंचम भावाधिपति चंद्रमा कमजोर होकर अष्टम भाव में स्थित है , जिसके कारण बाल्यावस्था में बौद्धिक और जीवनशैली की कमजोरी महसूस की और उसे दूर करने के लिए असाधारण कार्य कर असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बनें।

स्‍व राजीव गांधी का चंद्रमा द्वादश भावाधिपति कमजोर होकर लग्‍न में स्थित है। इन्‍होने बाल्‍य काल में शारीरिक मामलों , बाहरी संदर्भों और आत्‍मविश्‍वास की कमी को महसूस किया औ उसे दूर करने के लिए असाधारण कार्य कर असाधारण व्‍यक्तित्‍व के मालिक बनें।

वास्‍तव में चंद्रमा कमजोर रहने से व्‍यक्ति में धैर्य , सहनशीलता , आदि गुणों की प्रचुरता रहती है , जो आगे बढने में सहायता प्रदान करती है। यदि अन्‍य ग्रहों का अच्‍छा प्रभाव हो , तो व्‍यक्ति असाधारण कार्य कर बैठता  है।

Sunday, 7 November 2010

बाल्‍यावस्‍था का प्रतीक ग्रह : चंद्रमा

पिछले आलेख में स्‍पष्‍ट हो चुका है कि चंद्रमा पृथ्‍वी का सबसे निकटतम ग्रह है , इस कारण इसका प्रभाव पृथ्‍वी पर सबसे अधिक पडता है। समुद्र में ज्‍वार भाटा का आना इसका सबसे अच्‍छा उदाहरण है। मनुष्‍य के जीवन में   चंद्रमा का सर्वाधिक प्रभाव बचपन पर पडता है। यदि मजबूत चंद्रमा लग्‍नेश (लग्‍न का स्‍वामी) , षष्‍ठेश(छठे भाव का स्‍वामी) , लग्‍नस्‍थ(लग्‍न में स्थित) या षष्‍ठस्‍थ(छठे भाव में‍ स्थित) हो तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत मजबूत होते हैं। विलोमत: यदि कमजोर चंद्रमा लग्‍नेश , षष्‍ठेश , लग्‍नस्‍थ या षष्‍ठस्‍थ हो तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत कमजोर होते हैं।

इसके अतिरिक्‍त यदि कर्क राशि में लग्‍नेश तथा मिथुन  , कर्क या सिंह राशि में सूर्य रहे तो बच्‍चे शरीर से मजबूत होते हैं , चाहे चंद्रमा कमजोर हो या मजबूत। इसके विपरीत यदि कर्क राशि में लग्‍नेश तथा धनु , मकर और कुंभ राशि में सूर्य हो तो वैसे बच्‍चे शरीर से कमजोर होंगे , चाहे चंद्रमा कमजोर हो या मजबूत। विभिन्‍न लग्‍नवालों के लिए कमजोर या मजबूत चंद्रमा का प्रभाव भिनन भिन्‍न होता है।

मेष लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अंतर्मन में अपने को माता से असंतुष्‍ट महसूस करते हैं। यदि चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हो तो बच्‍चा बचपन में ही मां से दूर हो जाता है। इसके विपरीत मजबूत चंद्र में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे माता का पूर्ण सुख प्राप्‍त करते हैं , वे या तो बडे या इकलौते होते हैं , जिनपर मां का पूरा ध्‍यान होता है।

वृष लग्‍न में कमजोर चंद्रमा में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे भाई बहन से किसी न किसी प्रकार का बुरा अनुभव प्राप्‍त करते हैं , यदि चंद्रमा षष्‍ठस्‍थ हो तो उनका भाई बहनों से बहुत झगडा होता है। इसके विपरीत मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों का भाई बहन के साथ मधुर संबंध होता है।

मिथुन लग्‍न में कमजोर चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चों के आसपास का वातावरण ऐसा होता है कि वे अपने को साधनहीन मानने लगते हैं। इसके विपरीत मिथुन लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को साधन संपन्‍न और सुखी मानते हैं।

कर्क लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बाल्‍यावस्‍था में शरीर से कमजोर होते हैं , उनको किसी प्रकार का शारिरीक कष्‍ट बना रहता है , पर इस लग्‍न में मजबूत चांद में पैदा होने वाले बच्‍चे शरीर से बहुत मजबूत होते हैं।

सिंह लग्‍न के बच्‍चे , जिनका चंद्रमा कमजोर है , अभाव महसूस करते हैं जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के ऊपर काफी खर्च किया जाता है और वे अपने को संतुष्‍ट महसूस करते हैं। किंतु यदि सूर्य कर्क राशि में स्‍िथत हो , तो मजबूत चांद होने के बावजूद बच्‍चे को गंभीर शारिरीक कष्‍ट होता है।

कन्‍या लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे स्‍वयं को किसी प्रकार की लाभ प्राप्ति के लिए कमजोर पाते हैं , पर इस लग्‍न में मजबूत चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चों को किसी प्रकार का लाभ आसानी से प्राप्‍त हो जाता है।

तुला लग्‍न में कमजोर चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चों को बचपन में उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है , जिससे उनके मन को चोट पहुंचती है , पर इस लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को महत्‍वपूर्ण समझा जाता है और उसका पूरा ख्‍याल रखा जाता है।।

वृश्चिक लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को अभागा और कमजोर महसूस करते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को भाग्‍यशाली और हिम्‍मतवर मानते हैं।

धनु लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपनी दिनचर्या में अपने को बंधा हुआ महसूस करते हैं , जबकि इसी लग्‍न में मजबूत चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चे मनमौजी और लापरवाह होते हैं।

मकर लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे दोस्‍त का अभाव महसूस करते हैं , पारिवारिक माहौल भी कमजोर होता है । किंतु इस लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को खेलने के लिए बहुत सारे दोस्‍त होते हैं , पारिवारिक माहौल बहुत ही बढिया होता है।

कुंभ लग्‍न में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों में रोगप्रतिरोधक क्षमता की कमी होने से बाल्‍यावस्‍था में शारीरिक कष्‍ट होता रहता है। इसके विपरीत इस लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है , इसलिए बचपन अच्‍छा होता है।

मीन लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे प्रारंभ में मंदबुद्धि के देखे गए हैं , जिससे वे अपने को उपेक्षित महसूस करते है , पर मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपनी तीक्ष्‍णबुद्धि के कारण परिवार वालों को विशेष लाड प्‍यार प्राप्‍त करते हैं।

इस प्रकार 12 वर्ष की उम्र तक बच्‍चों की सफलता , असफलता , मानसिक स्थित या उनके अन्‍य व्‍यवहार का कारण चंद्रमा होता है। आज के युग में चूंकि अभिभावक बच्‍चों के क्रियाकलापों के प्रति अधिक जागरूक है और उनके चहुंमुखी विकास के लिए प्रयत्‍नशील भी , अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लिए बच्‍चों के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध हो उठते हैं। बच्‍चों के ऐसे व्‍यवहार का कोई कारण उन्‍हे समझ में नहीं आता है। अभिभावको को बच्‍चों कर सफलता के साथ साथ उनकी असफलताओं को भी धैर्यपूर्वक स्‍वीकारना चाहिए , क्‍यूंकि ऐसे बच्‍चे अधिक महत्‍वाकांक्षी होने के कारण तरक्‍की करते देखे जाते हैं और 'पूत के पांव पालने में ही दिखते हैं' को एक सिरे से खारिज करते हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से चंद्रमा के कारण बच्‍चे में कोई शारीरिक या मानसिक समस्‍या उपस्थित हो तो उसका समाधान 12 वर्ष की उम्र के पश्‍चात संभावित है।

Sunday, 24 October 2010

ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति का राज सूर्य से सभी ग्रहों की कोणिक दूरी में ही है !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को अच्‍छी तरह समझने के लिए जन्‍मकुंडली में एक ग्रह की दूसरे से कोणिक दूरी और उनकी अपनी गति के साथ साथ राशिश की सापेक्षिक गति को भी जानना आवश्‍यक होता है , इसलिए सबसे पहले जन्‍मकुंडली में एक ग्रह से दूसरे की कोणिक दूरी के बारे में जानना आवश्‍यक है। वैसे तो इसकी जानकारी के लिए जातक के जन्‍म के समय के पंचांग की आवश्‍यकता पडती है, चूंकि आसमान का फैलाव 360 डिग्री तक का है , इसलिए किसी भी ग्रह की स्थिति 360 डिग्री तक ही होती है। पंचांग से किन्‍हीं भी दो ग्रहों के मध्‍य की डिग्री के अंतर को देखना आसान होता है। चूंकि सूर्य पूरे सौरमंडल की उर्जा का स्रोत है , 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ग्रहों की शक्ति को निकालने के लिए सभी ग्रहों की सूर्य से कोणिक दूरी पर ही धन देता है।

पिछले पाठ में बताया गया था कि चंद्रमा की शक्ति का निर्धारण करने के लिए उसके आकार का ध्‍यान रखा जाता है , वह भी इसलिए कि सूर्य से दूरी के घटने बढने से उसके आकार में घटत बढत होती रहती है , इसी आधार पर चंद्रमा की गत्‍यात्‍मक शक्ति भी घटती बढती है। चंद्र की तरह ही सभी ग्रह सूर्य से ही ऊर्जा लेते हैं , इसलिए उनकी शक्ति का निर्धारण भी हम सूर्य से दूरी के आधार पर ही करते हैं। वैसे तो पंचांग को देखकर सूर्य से सभी ग्रहों की दूरी निकाली जा सकती है , पर यदि पंचांग न हो तो , जन्‍मकुंडली को देखकर भी हम बुध और शुक्र के अलावे अन्‍य ग्रहों जैसे मंगल , बृहस्‍पति और शनि की सूर्य से दूरी और उसकी गत्‍यात्‍मक शक्ति का आकलन कर सकते हैं।

पिछले पाठ में बताया गया है और हम भी आसमान में देखा करते हैं कि चंद्रमा की कोणिक दूरी ज्‍यों ज्‍यों सूर्य से बढती जाती है , त्‍यों त्‍यों उसका आकार बढता है और वह मजबूत होता जाता है। जन्‍मकुंडली में भी सूर्य के सामने होने पर चंद्रमा पूर्णिमा का होता है , जबकि सूर्य के साथ होने पर अमावस्‍या का होता है। पर मंगल , बृहस्‍पति और शनि के साथ विपरीत स्थिति होती है। जन्‍मकुंडली में ये तीनों ग्रह सूर्य के साथ हो तो अधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न होते हैं और जैसे जैसे सूर्य से इनकी दूरी बढती जाती है , अपेक्षाकृत शक्ति‍ में कमी आती है। सूर्य के सामने वाले जगहों पर तो ये शक्तिहीन हो जाते हैं और इनकी गति तक वक्री हो जाती है। पुन: आगे बने पर जैसे जैसे वे सूर्य की दिशा में प्रवृत्‍त होते उनकी शक्ति बढने लगती है , क्रमश: मार्गी होने लगते हैं और सूर्य के समीप आते आते पुन: उसकी शक्ति बढ जाती है।

मंगल , बृहस्‍पति या शनि जिस जिस भाव के स्‍वामी होते हैं , उससे संबंधित सुख या दुख उनकी शक्ति‍  के अनुरूप ही जातक को मिल पाता है। यदि मंगल मजबूत हो , तो मेष और वृश्चिक राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि मंगल के कमजोर होने पर मेंष और वृश्चिक राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। मंगल सामान्‍य हो तो मेष और वृश्चिक राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। इसी प्रकार यदि बृहस्‍पति मजबूत हो , तो धनु और मीन राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि बृहस्‍पति के कमजोर होने पर धनु और मीन राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। बृहस्‍पति सामान्‍य हो तो धनु और मीन राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। इसी तरह यदि शनि मजबूत हो , तो मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि शनि के कमजोर होने पर मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। शनि सामान्‍य हो तो मकर और कुंभ राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है।

Friday, 8 October 2010

राशिफल की वास्‍तविकता क्‍या है ??

जहां एक ओर ज्‍योतिष को बहुत ही सूक्ष्‍म तौर पर गणना करने वाला शास्‍त्र माना जाता है , वहीं दूसरी ओर पूरी जनसंख्‍या को 12 भागों में बांटकर उनकी राशि के आधार पर राशिफल के रूप में भविष्‍यवाणी करने का प्रचलन भी है। राशिफल के द्वारा दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटकर उनके बारे में भविष्‍यवाणी करने का प्रयास आमजनों को भले ही नहीं जंचे , पर इसके वैज्ञानिक आधार की उपेक्षा नहीं की जा सकती। राशिफल की शुरूआत उस वक्‍त की मानी जा सकती है , जब आम लोगों के पास उनके जन्‍म विवरण न हुआ करते हों पर अपने भविष्‍य के बारे में जानने की कुछ इच्‍छा रहती हो। पंडितो द्वारा रखे गए नाम में से उनकी राशि को समझ पाना आसान था, इसलिए ज्‍योतिषियों ने उनकी राशि के आधार पर गोचर के ग्रहों को देखते हुए भविष्‍यवाणी करने की परंपरा शुरू की हो। चूकि प्राचीन काल में अधिकांश लोगों की जन्‍मकुंडलियां नहीं हुआ करती थी , इसलिए राशिफल की लोकप्रियता निरंतर बढती गयी।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍यातिष' के हिसाब से चंद्र राशि या सूर्य राशि की तुलना में लग्‍न राशि के आधार पर की गयी मासिक , साप्‍ताहिक या दैनिक भविष्‍यवाणियां अधिक उपयोगी हो सकती है। राशि के आधार पर शुभ या अशुभ दिनों की चर्चा भले ही की जा सकती है , पर संदर्भों को तय करने में लग्‍न की भूमिका महत्‍वपूर्ण होती है , इसलिए विभिन्‍न संदर्भों की स्थिति को जानने के लिए अपना लग्‍न जानना आवश्‍यक होता है। इसलिए लग्‍न  के हिसाब से दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटा जा सकता है और उनके बारे में बहुत सारी बाते कही जा सकती हैं ,  भले ही उसमें स्तर , वातावरण , परिस्थिति और उसके जन्मकालीन ग्रहों के सापेक्ष कुछ अंतर हो। जैसे किसी विशेष समय में किसी राशि  के लिए लाभ एक मजदूर को 25-50 रुपए का और एक व्यवसायी को लाखों का लाभ दे सकता है।  

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' मानता है कि भले ही किसी व्‍यक्ति के जन्‍मकालीन ग्रह उसके जीवन की एक रूप रेखा निश्चित कर देते हें , पर समय समय पर आनेवाले गोचर के ग्रह भी उसके दिलोदिमाग पर कम प्रभाव नहीं डालते। इसलिए यह राशिफल को भी सहज नहीं लेता , जहां यह राशिफल की जगह लग्‍नफल को अधिक महत्‍व देता है , ताकि राशिफल में सटीकता बनी रहे , वहीं इसमें गोचर के ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति  का उपयोग राशिफल लिखने के लिए किया जाता है। यदि 2010 के वार्षिक लग्‍न राशिफल लिखना हो , तो सबसे पहले शनि की स्थिति को देखना आवश्‍यक है , क्‍यूंकि यह वर्षभर लगभग एक ही राशि में होता है। इसके बाद बृहस्‍पति की स्थिति तथा अन्‍य ग्रहों की स्थिति को देखते हुए जातक के लिए वर्षभर की परिस्थितियों का आकलन किया जाता है। महीनेभर की राशिफल लिखते वक्‍त महीनेभर के ग्रहों की स्थिति को ध्‍यान में रखा जा सकता है। इसी प्रकार प्रतिदिन के र‍ाशिफल के लिए प्रतिदिन की ग्रह स्थिति और विशेष घंटे के राशिफल के लिए विशेष घंटे की ग्रहस्थिति का ध्‍यान रखा जाता है।

जैसा कि पूर्व आलेख में भी बताया गया है कि परंपरागत ज्‍योतिष ग्रहों की स्थिति पर आधारित है , जबकि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ग्रहों की शक्ति पर आधारित है , इसलिए राशिफल की जानकारी के लिए यहां सभी ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का आकलन किया जाता है, इससे विभिन्‍न ग्रहों की विशेष क्रियाशीलता का पता चलता है , जिससे भविष्‍यवाणी को समययुक्‍त बनाया जा सकता है। ढाई वर्षों तक एक ही राशि में रहनेवाला शनि तथा वर्षभर एक ही राशि में बृहस्‍पति हर दिन प्रभावी नहीं होता , उसकी क्रियाशीलता का एक खास समय होता है , उसकी गणना हमारी भविष्‍यवाणियों को सटीक बनाती है।

वैसे तो लग्‍न राशिफल सामान्‍य लोगों के लिए ही लिखा जाता है , पर उसे जन्‍मकुंडली के सापेक्ष देखे जाने से यह अधिक सटीक हो सकता है। सामान्‍य लोगों के लिए लिखी गयी भविष्‍यवाणी में से कौन सी पंक्ति किस जातक के लिए अधिक प्रभावी होगी , इसे जातक की जन्‍मकुंडली देखकर समझा जा सकता है। विभिन्‍न ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति के आधार पर सामान्‍य लोगों के लिए उससे संबंधित कई सामान्‍य पंक्तियां कही जा सकती हैं , जिनमें से कोई पंक्ति किसी के लिए अधिक प्रभावी तथा कोई पंक्ति किसी के लिए कम प्रभावी हो सकती है। पर जन्‍मकुंडली को देखने से यह सटीक ढंग से कहा जा सकता है कि जातक के लिए कौन सी पंक्ति अधिक या कम प्रभावी होगी। इसके लिए इस बात को ध्‍यान में रखा जाता है कि गोचर के ग्रहों की खास स्थिति जातक की जन्‍मकुंडली के अनुकूल है या प्रतिकूल  ??

Saturday, 2 October 2010

आइए आज जन्‍मकालीन चंद्रमा के प्रभाव के बारे में कुछ जानते हैं !!

व्‍यस्‍तता के कारण इधर काफी दिनों से इस ब्‍लॉग को अपडेट नहीं कर पा रही थी , कल इस बारे में हेम पांडेय जी की भी टिप्‍पणी मिली। वास्‍तव मेंपरंपरागत ज्‍योतिष के जिन तथ्‍यों को हमने गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के आधार के तौर पर लिया है , उसके बारे में चर्चा भी आवश्‍यक है। उसके बाद ही ज्‍योतिष के हमारे 'गत्‍यात्‍मक पक्ष' को समझा जा सकता है। अभी तक आसमान में 12 भागों में विभाजन के रूप में बनीं राशियों उस आधार पर बच्‍चे के लग्‍न , सूर्यराशि , चंद्र राशि आदि के निर्धारण के बारे में बताया जा चुका है। जन्‍मकुंडली निर्माण के लिए आवश्‍यकसभी तालिकाऔर पंचांग ज्‍योतिष की विभिन्‍न पुस्‍तकों में मिल जाते हैं , इसलिए उनकी चर्चा न कर मैं सीधा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के फलित के भाग में आती हूं।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से चंद्रमा हमारे सबसे निकट का ग्रह है और इसलिए इसका मनुष्‍य के जीवन में क्षणिक ही सही , पर सबसे अधिक प्रभाव है। खासकर यह हमारे मन को ही प्रभावित करता है , इसलिए हमारे मन को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएं दुर्घटनाएं इसी के कारण होती है। इसके अलावे हम सभी महसूस करते हैं कि बचपन के मनोवैज्ञानिक विकास में बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य , मिलनेवाले प्‍यार दुलार और  आसपास के वातावरण का बहुत बडा प्रभाव होता है। बचपन और कुछ से नहीं , मन के सुख दुख से प्रभावित होता है , इसलिए मनुष्‍य के बालपन में चंद्रमा का खासा महत्‍व होता है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में चंद्रमा की शक्ति का निर्णय इसके आकार के हिसाब से किया जाता है। चंद्रमा जब बडा हो , यानि पूर्णिमा का हो , वह सबसे अधिक शक्ति संपन्‍न होगा। इसके अतिरिक्‍त छोटा यानि अमावस्‍या का चंद्रमा सबसे शक्तिहीन होता है। इस तरह जैसे जैसे चंद्रमा का आकार छोटा होता जाता है , उसकी शक्ति कम होती जाती है। यही कारण है कि पूर्णिमा के आसपास जन्‍म लेने वाले बच्‍चों के समक्ष घर परिवार में कुछ अधिक ही लाड प्‍यार का माहौल मिलता है , इस कारण उनकी जिद की प्रवृत्ति भी बढती है , वैसे मनोवैज्ञानिक विकास सही होने के कारण ऐसे बच्‍चे अपनी बात आगे रखने में अधिक सक्षम होते हैं। जबकि अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवालों के समक्ष ऐसा वातावरण होता है कि जरूरत के हिसाब से उनके लाड प्‍यार में कुछ कमी हो जाती है। मन में कुछ भावनाओं के दबे होने से उनका मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होता है , जिसका प्रभाव बाद के जीवन में भी देखा जाता है।

वैसे तो चंद्रमा का कुंडली के विभिन्‍न स्‍थानों पर बैठना भी महत्‍व रखता है , पर शक्ति के अनुसार चंद्रमा के फल में हमें काफी सटीकता मिली है। वैसे तो मजबूत या कमजोर चंद्रमा का प्रभाव बचपन में पूरे माहौल में नजर आता है , पर अधिक असर उन भावों पर होता है , जिनका स्‍वामी चंद्र हो या जिस भाव में चंद्र की स्थिति हो। चंद्रमा मजबूत हो , तो जिस भाव का स्‍वामी हो और जिस भाव में स्थित हो , जीवन में उससे संबंधित फल मजबूत प्राप्‍त होता है। खासकर बचपन में इसका असर खूब देखने को मिलता है।

इसके विपरीत चंद्रमा कमजोर हो , तो जिस भाव का स्‍वामी हो और जिस भाव में स्थित हो , जीवन में उससे संबंधित ऋणात्‍मक फल मिलता है। इसका असर भी बचपन में ही अधिक देखने को मिलता है। आज के लेख के हिसाब से अष्‍टमी में जन्‍म लेने वाले बच्‍चों के चंद्रमा का फल आप नहीं समझ पाएंगे , पर इतना अवश्‍य है कि अष्‍टमी के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चो के समक्ष माहौल ऐसा होता है कि वे मन से बहुत ही संतुलित होते हैं । और खासकर यह संतुलन उन मामलों में अधिक दिखाई पडता है , जिन मामलों का स्‍वामी चंद्रमा होता है और जिस भाव में वो स्थित होता है।

Saturday, 28 August 2010

गोचर क्‍या होता है ??

ज्‍योतिष में रूचि रखने वाले भी बहुत लोग गोचर का अर्थ नहीं जानते हैं। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रहों की गति ही गोचर कहलाती है। आकाश में वर्तमान में कौन सा ग्रह किस राशि और नक्षत्र में चल रहा है, यही ग्रहों का गोचर है , जिसे हम पंचांग के माध्‍यम से जान पाते हैं। भले ही हम जीवनभर की परिस्थितियां अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्‍त करते हों , पर गोचर का विचार फलित करते समय महत्‍वपूर्ण माना जाता है , क्‍यूंकि अस्‍थायी समस्‍याओं को जन्‍म देने में इसकी बडी भूमिका होती है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से किसी राशि या नक्षत्र में कोई ग्रह शुभ या अशुभ नहीं होते , हां उनके प्रभाव में थोडी बहुत कमी अवश्‍य आ सकती है। अलग अलग व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली के हिसाब से एक ही राशि में स्थि‍त शनि किसी को अच्‍छे तो किसी को बुरे फल से संयुक्‍त कर सकता है।

इतने लंबे जीवन में हम पाते हैं कि वर्षभर के 365 दिन ही क्‍या , दिनभर के 24 घंटे एक समान नहीं होते। एक पल में हम मौज और मस्‍ती कर रहे होते हैं , तो दूसरे ही पल तमाम जिम्‍मेदारियां मुंह बाये खडी होती है , तीसरे ही पल किसी न किसी प्रकार का तनाव हमारे जीवन में आ जाता है। पर्याप्‍त रिसर्च के अभाव में भले ही एक एक पल के इस सुखमय और दुखमय समय के बारे में पहले से जानना कठिन हो , पर ये माहौल गोचर के ग्रहों की स्थिति से ही जन्‍म लेती है। शनि के कारण आप ढाई वर्षों तक किसी समस्‍या से निरंतर जूझ सकते हैं , जबकि बृहस्‍पति की स्थिति से एक वर्ष तक , एक छोटा सा चंद्रमा हमें ढाई दिनों तक परेशान कर सकता है तथा आसमान की अन्‍य स्थिति पर हम ध्‍यान दें तो एक एक घटी और पल के सुख दुख का अनुमान लगाया जा सकता है।

इस तरह भले ही जीवन भर प्राप्‍त सुख दुख और दीर्घकालीन उतार चढाव हम अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्त करते हों, परछोटी छोटी अवधि में आनेवाली बाधाएं गोचर के ग्रहों पर आधारित होती हैं और इसलिए भविष्‍य कथन में इनका ध्‍यान रखना आवश्‍यक होता है। जैसे जन्‍मकालीन ग्रहों की स्थिति के आधार पर किसी युवक या युवति के वैवाहिक संदर्भों में कोई कठिनाई न हो , तो विवाह मनोनुकूल स्‍थान में होने की पूरी संभावना रहेगी , पर कभी कभी विवाह में खासी समस्‍याएं आ जाती हैं। या तो विवाह में देर होती है या फिर कोई दूसरी समस्‍या। ऐसा इसलिए होता है क्‍यूंकि जब वो या उनके अभिभावक विवाह के लिए गंभीर हुए , वैवाहिक मामलों के लिए जिम्‍मेदार कोई ग्रह गोचर में अच्‍छी स्थिति में न चल रहा होता है। गोचर के ग्रह कभी कभी छह सात वर्षों तक किसी प्रकार की बाधा उपस्थित करने में जिम्‍मेदार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में जन्‍मकालीन ग्रहों के आधार पर हमारे द्वारा बनाया जानेवाला जातक का जीवनग्राफ भी काम नहीं करते देखा जाता है। यही कारण है कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' गोचर के ग्रहों को बहुत महत्‍व देता है।

Wednesday, 25 August 2010

जन्‍मकुंडली में सर्वाधिक महत्‍व लग्‍न का होता है !!

पुराने लेखों में मैने बताया ही है कि जन्‍मकुंडली में सर्वाधिक महत्‍व लग्‍न यानि पूर्वी क्षितिज में उदित होनेवाली राशि का होता है । लग्‍न के सापेक्ष सभी ग्रहों की स्थिति ही एक जातक की परिस्थितियां भिन्‍न होती हैं और उनके के सोंचने का ढंग भी अलग होता है । लग्‍न की जानकारी के लिए हमारे पंचांगों में एक चार्ट होता है , जिसमें बच्‍चे के जन्‍म तिथि , जन्‍मसमय और जन्‍मस्‍थान के आधार पर उसके लग्‍न की जानकारी हो जाती है। आज तो किसी जातक का लग्‍न निकालने के लिए बहुत सुविधा हो गयी है। इंटरनेट में भी आप किसी बच्‍चे के लग्‍न की जानकारी के लिए कई लिंकों पर जा सकते हैं , यहां और यहां । जन्‍म के शहर के लांगिच्‍यूड और लैटिच्‍यूड के लिए आप इस लिंक पर भी जा सकते हैं।

पूर्व के लेखों में बताया गया है कि सूर्य प्रत्‍येक राशि में एक एक महीने महीने भ्रमण करता हुआ सौरवर्ष के अंत में पुन: उसी स्‍थान पर आ जाता है। इस सूर्य और जन्‍म समय के आधार पर हम मोटा मोटी तौर पर किसी बच्‍चे के जन्‍म लग्‍न का अनुमान भी कर सकते हैं। 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य सूर्य मेष राशि में होता है , इसलिए उस समय सूर्योदय के आसपास जन्‍म लेने वाला मेष लग्‍न में ही होगा , क्रमश: दो दो घंटे बाद लग्‍न परिवर्तित होता जाता है , इसलिए लगभग दो दो घंटे बाद जन्‍मलेने वाले बच्‍चे अगले लग्‍न में आते चले जाएंगे। इस माह मध्‍य दोपहर में जन्‍म लेनेवाला बच्‍चा कर्क लग्‍न में तथा सूर्यास्‍त के समय जन्‍म लेनेवाला बच्‍चे का जन्‍म मेष के ठीक सामने वाली राशि में यानि तुला लग्‍न में होगा। इसी प्रकार मध्‍य रात्रि में जन्‍म लेनेवाला बच्‍चे का लग्‍न मकर होगा।

इसी प्रकार सूर्य के वृष  राशि में होने के वक्‍त यानि 15 मई से 15 जून के मध्‍य सूर्योदय के आसपास जन्‍म लेनेवाला बालक वृष लग्‍न में जन्‍म लेगा , दो दो घंटे बाद जन्‍मलेनेवालों के लग्‍न आगे बढते चले जाएंगे और दो पहर के मध्‍य जन्‍म लेनेवाला सिंह लग्‍न में , सूर्यास्‍त के वक्‍त जन्‍म लेनेवाला वृश्चिक में तथा मध्‍य रात्रि को ज्न्‍म लेनेवाले का जन्‍म कुंभ लग्‍न में होगा। इसी प्रकार आगे के महीनों में सूर्य के राशि परिवर्तन के बाद यह चक्र बढता चला जाएगा। इस आधार पर आप मोटा मोटी तौर पर जातक के लग्‍न की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं। मैने बारहो महीनों के लग्‍न चार्ट को एक छोटे से ग्राफ पेपर में भी समेटा है , उसके आधार पर भी आप किसी भी व्‍यक्ति की जन्‍म तिथि , जन्‍मसमय और स्‍थानीय समय के आधार पर जातक के लग्‍न का पता कर सकते हैं।