Sunday, 7 November 2010

बाल्‍यावस्‍था का प्रतीक ग्रह : चंद्रमा

पिछले आलेख में स्‍पष्‍ट हो चुका है कि चंद्रमा पृथ्‍वी का सबसे निकटतम ग्रह है , इस कारण इसका प्रभाव पृथ्‍वी पर सबसे अधिक पडता है। समुद्र में ज्‍वार भाटा का आना इसका सबसे अच्‍छा उदाहरण है। मनुष्‍य के जीवन में   चंद्रमा का सर्वाधिक प्रभाव बचपन पर पडता है। यदि मजबूत चंद्रमा लग्‍नेश (लग्‍न का स्‍वामी) , षष्‍ठेश(छठे भाव का स्‍वामी) , लग्‍नस्‍थ(लग्‍न में स्थित) या षष्‍ठस्‍थ(छठे भाव में‍ स्थित) हो तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत मजबूत होते हैं। विलोमत: यदि कमजोर चंद्रमा लग्‍नेश , षष्‍ठेश , लग्‍नस्‍थ या षष्‍ठस्‍थ हो तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत कमजोर होते हैं।

इसके अतिरिक्‍त यदि कर्क राशि में लग्‍नेश तथा मिथुन  , कर्क या सिंह राशि में सूर्य रहे तो बच्‍चे शरीर से मजबूत होते हैं , चाहे चंद्रमा कमजोर हो या मजबूत। इसके विपरीत यदि कर्क राशि में लग्‍नेश तथा धनु , मकर और कुंभ राशि में सूर्य हो तो वैसे बच्‍चे शरीर से कमजोर होंगे , चाहे चंद्रमा कमजोर हो या मजबूत। विभिन्‍न लग्‍नवालों के लिए कमजोर या मजबूत चंद्रमा का प्रभाव भिनन भिन्‍न होता है।

मेष लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अंतर्मन में अपने को माता से असंतुष्‍ट महसूस करते हैं। यदि चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हो तो बच्‍चा बचपन में ही मां से दूर हो जाता है। इसके विपरीत मजबूत चंद्र में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे माता का पूर्ण सुख प्राप्‍त करते हैं , वे या तो बडे या इकलौते होते हैं , जिनपर मां का पूरा ध्‍यान होता है।

वृष लग्‍न में कमजोर चंद्रमा में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे भाई बहन से किसी न किसी प्रकार का बुरा अनुभव प्राप्‍त करते हैं , यदि चंद्रमा षष्‍ठस्‍थ हो तो उनका भाई बहनों से बहुत झगडा होता है। इसके विपरीत मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों का भाई बहन के साथ मधुर संबंध होता है।

मिथुन लग्‍न में कमजोर चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चों के आसपास का वातावरण ऐसा होता है कि वे अपने को साधनहीन मानने लगते हैं। इसके विपरीत मिथुन लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को साधन संपन्‍न और सुखी मानते हैं।

कर्क लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बाल्‍यावस्‍था में शरीर से कमजोर होते हैं , उनको किसी प्रकार का शारिरीक कष्‍ट बना रहता है , पर इस लग्‍न में मजबूत चांद में पैदा होने वाले बच्‍चे शरीर से बहुत मजबूत होते हैं।

सिंह लग्‍न के बच्‍चे , जिनका चंद्रमा कमजोर है , अभाव महसूस करते हैं जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के ऊपर काफी खर्च किया जाता है और वे अपने को संतुष्‍ट महसूस करते हैं। किंतु यदि सूर्य कर्क राशि में स्‍िथत हो , तो मजबूत चांद होने के बावजूद बच्‍चे को गंभीर शारिरीक कष्‍ट होता है।

कन्‍या लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे स्‍वयं को किसी प्रकार की लाभ प्राप्ति के लिए कमजोर पाते हैं , पर इस लग्‍न में मजबूत चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चों को किसी प्रकार का लाभ आसानी से प्राप्‍त हो जाता है।

तुला लग्‍न में कमजोर चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चों को बचपन में उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है , जिससे उनके मन को चोट पहुंचती है , पर इस लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को महत्‍वपूर्ण समझा जाता है और उसका पूरा ख्‍याल रखा जाता है।।

वृश्चिक लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को अभागा और कमजोर महसूस करते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को भाग्‍यशाली और हिम्‍मतवर मानते हैं।

धनु लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपनी दिनचर्या में अपने को बंधा हुआ महसूस करते हैं , जबकि इसी लग्‍न में मजबूत चांद में जनम लेनेवाले बच्‍चे मनमौजी और लापरवाह होते हैं।

मकर लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे दोस्‍त का अभाव महसूस करते हैं , पारिवारिक माहौल भी कमजोर होता है । किंतु इस लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को खेलने के लिए बहुत सारे दोस्‍त होते हैं , पारिवारिक माहौल बहुत ही बढिया होता है।

कुंभ लग्‍न में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों में रोगप्रतिरोधक क्षमता की कमी होने से बाल्‍यावस्‍था में शारीरिक कष्‍ट होता रहता है। इसके विपरीत इस लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है , इसलिए बचपन अच्‍छा होता है।

मीन लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे प्रारंभ में मंदबुद्धि के देखे गए हैं , जिससे वे अपने को उपेक्षित महसूस करते है , पर मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपनी तीक्ष्‍णबुद्धि के कारण परिवार वालों को विशेष लाड प्‍यार प्राप्‍त करते हैं।

इस प्रकार 12 वर्ष की उम्र तक बच्‍चों की सफलता , असफलता , मानसिक स्थित या उनके अन्‍य व्‍यवहार का कारण चंद्रमा होता है। आज के युग में चूंकि अभिभावक बच्‍चों के क्रियाकलापों के प्रति अधिक जागरूक है और उनके चहुंमुखी विकास के लिए प्रयत्‍नशील भी , अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लिए बच्‍चों के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध हो उठते हैं। बच्‍चों के ऐसे व्‍यवहार का कोई कारण उन्‍हे समझ में नहीं आता है। अभिभावको को बच्‍चों कर सफलता के साथ साथ उनकी असफलताओं को भी धैर्यपूर्वक स्‍वीकारना चाहिए , क्‍यूंकि ऐसे बच्‍चे अधिक महत्‍वाकांक्षी होने के कारण तरक्‍की करते देखे जाते हैं और 'पूत के पांव पालने में ही दिखते हैं' को एक सिरे से खारिज करते हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से चंद्रमा के कारण बच्‍चे में कोई शारीरिक या मानसिक समस्‍या उपस्थित हो तो उसका समाधान 12 वर्ष की उम्र के पश्‍चात संभावित है।

Sunday, 24 October 2010

ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति का राज सूर्य से सभी ग्रहों की कोणिक दूरी में ही है !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को अच्‍छी तरह समझने के लिए जन्‍मकुंडली में एक ग्रह की दूसरे से कोणिक दूरी और उनकी अपनी गति के साथ साथ राशिश की सापेक्षिक गति को भी जानना आवश्‍यक होता है , इसलिए सबसे पहले जन्‍मकुंडली में एक ग्रह से दूसरे की कोणिक दूरी के बारे में जानना आवश्‍यक है। वैसे तो इसकी जानकारी के लिए जातक के जन्‍म के समय के पंचांग की आवश्‍यकता पडती है, चूंकि आसमान का फैलाव 360 डिग्री तक का है , इसलिए किसी भी ग्रह की स्थिति 360 डिग्री तक ही होती है। पंचांग से किन्‍हीं भी दो ग्रहों के मध्‍य की डिग्री के अंतर को देखना आसान होता है। चूंकि सूर्य पूरे सौरमंडल की उर्जा का स्रोत है , 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ग्रहों की शक्ति को निकालने के लिए सभी ग्रहों की सूर्य से कोणिक दूरी पर ही धन देता है।

पिछले पाठ में बताया गया था कि चंद्रमा की शक्ति का निर्धारण करने के लिए उसके आकार का ध्‍यान रखा जाता है , वह भी इसलिए कि सूर्य से दूरी के घटने बढने से उसके आकार में घटत बढत होती रहती है , इसी आधार पर चंद्रमा की गत्‍यात्‍मक शक्ति भी घटती बढती है। चंद्र की तरह ही सभी ग्रह सूर्य से ही ऊर्जा लेते हैं , इसलिए उनकी शक्ति का निर्धारण भी हम सूर्य से दूरी के आधार पर ही करते हैं। वैसे तो पंचांग को देखकर सूर्य से सभी ग्रहों की दूरी निकाली जा सकती है , पर यदि पंचांग न हो तो , जन्‍मकुंडली को देखकर भी हम बुध और शुक्र के अलावे अन्‍य ग्रहों जैसे मंगल , बृहस्‍पति और शनि की सूर्य से दूरी और उसकी गत्‍यात्‍मक शक्ति का आकलन कर सकते हैं।

पिछले पाठ में बताया गया है और हम भी आसमान में देखा करते हैं कि चंद्रमा की कोणिक दूरी ज्‍यों ज्‍यों सूर्य से बढती जाती है , त्‍यों त्‍यों उसका आकार बढता है और वह मजबूत होता जाता है। जन्‍मकुंडली में भी सूर्य के सामने होने पर चंद्रमा पूर्णिमा का होता है , जबकि सूर्य के साथ होने पर अमावस्‍या का होता है। पर मंगल , बृहस्‍पति और शनि के साथ विपरीत स्थिति होती है। जन्‍मकुंडली में ये तीनों ग्रह सूर्य के साथ हो तो अधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न होते हैं और जैसे जैसे सूर्य से इनकी दूरी बढती जाती है , अपेक्षाकृत शक्ति‍ में कमी आती है। सूर्य के सामने वाले जगहों पर तो ये शक्तिहीन हो जाते हैं और इनकी गति तक वक्री हो जाती है। पुन: आगे बने पर जैसे जैसे वे सूर्य की दिशा में प्रवृत्‍त होते उनकी शक्ति बढने लगती है , क्रमश: मार्गी होने लगते हैं और सूर्य के समीप आते आते पुन: उसकी शक्ति बढ जाती है।

मंगल , बृहस्‍पति या शनि जिस जिस भाव के स्‍वामी होते हैं , उससे संबंधित सुख या दुख उनकी शक्ति‍  के अनुरूप ही जातक को मिल पाता है। यदि मंगल मजबूत हो , तो मेष और वृश्चिक राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि मंगल के कमजोर होने पर मेंष और वृश्चिक राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। मंगल सामान्‍य हो तो मेष और वृश्चिक राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। इसी प्रकार यदि बृहस्‍पति मजबूत हो , तो धनु और मीन राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि बृहस्‍पति के कमजोर होने पर धनु और मीन राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। बृहस्‍पति सामान्‍य हो तो धनु और मीन राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। इसी तरह यदि शनि मजबूत हो , तो मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि शनि के कमजोर होने पर मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। शनि सामान्‍य हो तो मकर और कुंभ राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है।

Friday, 8 October 2010

राशिफल की वास्‍तविकता क्‍या है ??

जहां एक ओर ज्‍योतिष को बहुत ही सूक्ष्‍म तौर पर गणना करने वाला शास्‍त्र माना जाता है , वहीं दूसरी ओर पूरी जनसंख्‍या को 12 भागों में बांटकर उनकी राशि के आधार पर राशिफल के रूप में भविष्‍यवाणी करने का प्रचलन भी है। राशिफल के द्वारा दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटकर उनके बारे में भविष्‍यवाणी करने का प्रयास आमजनों को भले ही नहीं जंचे , पर इसके वैज्ञानिक आधार की उपेक्षा नहीं की जा सकती। राशिफल की शुरूआत उस वक्‍त की मानी जा सकती है , जब आम लोगों के पास उनके जन्‍म विवरण न हुआ करते हों पर अपने भविष्‍य के बारे में जानने की कुछ इच्‍छा रहती हो। पंडितो द्वारा रखे गए नाम में से उनकी राशि को समझ पाना आसान था, इसलिए ज्‍योतिषियों ने उनकी राशि के आधार पर गोचर के ग्रहों को देखते हुए भविष्‍यवाणी करने की परंपरा शुरू की हो। चूकि प्राचीन काल में अधिकांश लोगों की जन्‍मकुंडलियां नहीं हुआ करती थी , इसलिए राशिफल की लोकप्रियता निरंतर बढती गयी।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍यातिष' के हिसाब से चंद्र राशि या सूर्य राशि की तुलना में लग्‍न राशि के आधार पर की गयी मासिक , साप्‍ताहिक या दैनिक भविष्‍यवाणियां अधिक उपयोगी हो सकती है। राशि के आधार पर शुभ या अशुभ दिनों की चर्चा भले ही की जा सकती है , पर संदर्भों को तय करने में लग्‍न की भूमिका महत्‍वपूर्ण होती है , इसलिए विभिन्‍न संदर्भों की स्थिति को जानने के लिए अपना लग्‍न जानना आवश्‍यक होता है। इसलिए लग्‍न  के हिसाब से दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटा जा सकता है और उनके बारे में बहुत सारी बाते कही जा सकती हैं ,  भले ही उसमें स्तर , वातावरण , परिस्थिति और उसके जन्मकालीन ग्रहों के सापेक्ष कुछ अंतर हो। जैसे किसी विशेष समय में किसी राशि  के लिए लाभ एक मजदूर को 25-50 रुपए का और एक व्यवसायी को लाखों का लाभ दे सकता है।  

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' मानता है कि भले ही किसी व्‍यक्ति के जन्‍मकालीन ग्रह उसके जीवन की एक रूप रेखा निश्चित कर देते हें , पर समय समय पर आनेवाले गोचर के ग्रह भी उसके दिलोदिमाग पर कम प्रभाव नहीं डालते। इसलिए यह राशिफल को भी सहज नहीं लेता , जहां यह राशिफल की जगह लग्‍नफल को अधिक महत्‍व देता है , ताकि राशिफल में सटीकता बनी रहे , वहीं इसमें गोचर के ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति  का उपयोग राशिफल लिखने के लिए किया जाता है। यदि 2010 के वार्षिक लग्‍न राशिफल लिखना हो , तो सबसे पहले शनि की स्थिति को देखना आवश्‍यक है , क्‍यूंकि यह वर्षभर लगभग एक ही राशि में होता है। इसके बाद बृहस्‍पति की स्थिति तथा अन्‍य ग्रहों की स्थिति को देखते हुए जातक के लिए वर्षभर की परिस्थितियों का आकलन किया जाता है। महीनेभर की राशिफल लिखते वक्‍त महीनेभर के ग्रहों की स्थिति को ध्‍यान में रखा जा सकता है। इसी प्रकार प्रतिदिन के र‍ाशिफल के लिए प्रतिदिन की ग्रह स्थिति और विशेष घंटे के राशिफल के लिए विशेष घंटे की ग्रहस्थिति का ध्‍यान रखा जाता है।

जैसा कि पूर्व आलेख में भी बताया गया है कि परंपरागत ज्‍योतिष ग्रहों की स्थिति पर आधारित है , जबकि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ग्रहों की शक्ति पर आधारित है , इसलिए राशिफल की जानकारी के लिए यहां सभी ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का आकलन किया जाता है, इससे विभिन्‍न ग्रहों की विशेष क्रियाशीलता का पता चलता है , जिससे भविष्‍यवाणी को समययुक्‍त बनाया जा सकता है। ढाई वर्षों तक एक ही राशि में रहनेवाला शनि तथा वर्षभर एक ही राशि में बृहस्‍पति हर दिन प्रभावी नहीं होता , उसकी क्रियाशीलता का एक खास समय होता है , उसकी गणना हमारी भविष्‍यवाणियों को सटीक बनाती है।

वैसे तो लग्‍न राशिफल सामान्‍य लोगों के लिए ही लिखा जाता है , पर उसे जन्‍मकुंडली के सापेक्ष देखे जाने से यह अधिक सटीक हो सकता है। सामान्‍य लोगों के लिए लिखी गयी भविष्‍यवाणी में से कौन सी पंक्ति किस जातक के लिए अधिक प्रभावी होगी , इसे जातक की जन्‍मकुंडली देखकर समझा जा सकता है। विभिन्‍न ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति के आधार पर सामान्‍य लोगों के लिए उससे संबंधित कई सामान्‍य पंक्तियां कही जा सकती हैं , जिनमें से कोई पंक्ति किसी के लिए अधिक प्रभावी तथा कोई पंक्ति किसी के लिए कम प्रभावी हो सकती है। पर जन्‍मकुंडली को देखने से यह सटीक ढंग से कहा जा सकता है कि जातक के लिए कौन सी पंक्ति अधिक या कम प्रभावी होगी। इसके लिए इस बात को ध्‍यान में रखा जाता है कि गोचर के ग्रहों की खास स्थिति जातक की जन्‍मकुंडली के अनुकूल है या प्रतिकूल  ??

Saturday, 2 October 2010

आइए आज जन्‍मकालीन चंद्रमा के प्रभाव के बारे में कुछ जानते हैं !!

व्‍यस्‍तता के कारण इधर काफी दिनों से इस ब्‍लॉग को अपडेट नहीं कर पा रही थी , कल इस बारे में हेम पांडेय जी की भी टिप्‍पणी मिली। वास्‍तव मेंपरंपरागत ज्‍योतिष के जिन तथ्‍यों को हमने गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के आधार के तौर पर लिया है , उसके बारे में चर्चा भी आवश्‍यक है। उसके बाद ही ज्‍योतिष के हमारे 'गत्‍यात्‍मक पक्ष' को समझा जा सकता है। अभी तक आसमान में 12 भागों में विभाजन के रूप में बनीं राशियों उस आधार पर बच्‍चे के लग्‍न , सूर्यराशि , चंद्र राशि आदि के निर्धारण के बारे में बताया जा चुका है। जन्‍मकुंडली निर्माण के लिए आवश्‍यकसभी तालिकाऔर पंचांग ज्‍योतिष की विभिन्‍न पुस्‍तकों में मिल जाते हैं , इसलिए उनकी चर्चा न कर मैं सीधा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के फलित के भाग में आती हूं।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से चंद्रमा हमारे सबसे निकट का ग्रह है और इसलिए इसका मनुष्‍य के जीवन में क्षणिक ही सही , पर सबसे अधिक प्रभाव है। खासकर यह हमारे मन को ही प्रभावित करता है , इसलिए हमारे मन को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएं दुर्घटनाएं इसी के कारण होती है। इसके अलावे हम सभी महसूस करते हैं कि बचपन के मनोवैज्ञानिक विकास में बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य , मिलनेवाले प्‍यार दुलार और  आसपास के वातावरण का बहुत बडा प्रभाव होता है। बचपन और कुछ से नहीं , मन के सुख दुख से प्रभावित होता है , इसलिए मनुष्‍य के बालपन में चंद्रमा का खासा महत्‍व होता है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में चंद्रमा की शक्ति का निर्णय इसके आकार के हिसाब से किया जाता है। चंद्रमा जब बडा हो , यानि पूर्णिमा का हो , वह सबसे अधिक शक्ति संपन्‍न होगा। इसके अतिरिक्‍त छोटा यानि अमावस्‍या का चंद्रमा सबसे शक्तिहीन होता है। इस तरह जैसे जैसे चंद्रमा का आकार छोटा होता जाता है , उसकी शक्ति कम होती जाती है। यही कारण है कि पूर्णिमा के आसपास जन्‍म लेने वाले बच्‍चों के समक्ष घर परिवार में कुछ अधिक ही लाड प्‍यार का माहौल मिलता है , इस कारण उनकी जिद की प्रवृत्ति भी बढती है , वैसे मनोवैज्ञानिक विकास सही होने के कारण ऐसे बच्‍चे अपनी बात आगे रखने में अधिक सक्षम होते हैं। जबकि अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवालों के समक्ष ऐसा वातावरण होता है कि जरूरत के हिसाब से उनके लाड प्‍यार में कुछ कमी हो जाती है। मन में कुछ भावनाओं के दबे होने से उनका मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होता है , जिसका प्रभाव बाद के जीवन में भी देखा जाता है।

वैसे तो चंद्रमा का कुंडली के विभिन्‍न स्‍थानों पर बैठना भी महत्‍व रखता है , पर शक्ति के अनुसार चंद्रमा के फल में हमें काफी सटीकता मिली है। वैसे तो मजबूत या कमजोर चंद्रमा का प्रभाव बचपन में पूरे माहौल में नजर आता है , पर अधिक असर उन भावों पर होता है , जिनका स्‍वामी चंद्र हो या जिस भाव में चंद्र की स्थिति हो। चंद्रमा मजबूत हो , तो जिस भाव का स्‍वामी हो और जिस भाव में स्थित हो , जीवन में उससे संबंधित फल मजबूत प्राप्‍त होता है। खासकर बचपन में इसका असर खूब देखने को मिलता है।

इसके विपरीत चंद्रमा कमजोर हो , तो जिस भाव का स्‍वामी हो और जिस भाव में स्थित हो , जीवन में उससे संबंधित ऋणात्‍मक फल मिलता है। इसका असर भी बचपन में ही अधिक देखने को मिलता है। आज के लेख के हिसाब से अष्‍टमी में जन्‍म लेने वाले बच्‍चों के चंद्रमा का फल आप नहीं समझ पाएंगे , पर इतना अवश्‍य है कि अष्‍टमी के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चो के समक्ष माहौल ऐसा होता है कि वे मन से बहुत ही संतुलित होते हैं । और खासकर यह संतुलन उन मामलों में अधिक दिखाई पडता है , जिन मामलों का स्‍वामी चंद्रमा होता है और जिस भाव में वो स्थित होता है।

Saturday, 28 August 2010

गोचर क्‍या होता है ??

ज्‍योतिष में रूचि रखने वाले भी बहुत लोग गोचर का अर्थ नहीं जानते हैं। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रहों की गति ही गोचर कहलाती है। आकाश में वर्तमान में कौन सा ग्रह किस राशि और नक्षत्र में चल रहा है, यही ग्रहों का गोचर है , जिसे हम पंचांग के माध्‍यम से जान पाते हैं। भले ही हम जीवनभर की परिस्थितियां अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्‍त करते हों , पर गोचर का विचार फलित करते समय महत्‍वपूर्ण माना जाता है , क्‍यूंकि अस्‍थायी समस्‍याओं को जन्‍म देने में इसकी बडी भूमिका होती है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से किसी राशि या नक्षत्र में कोई ग्रह शुभ या अशुभ नहीं होते , हां उनके प्रभाव में थोडी बहुत कमी अवश्‍य आ सकती है। अलग अलग व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली के हिसाब से एक ही राशि में स्थि‍त शनि किसी को अच्‍छे तो किसी को बुरे फल से संयुक्‍त कर सकता है।

इतने लंबे जीवन में हम पाते हैं कि वर्षभर के 365 दिन ही क्‍या , दिनभर के 24 घंटे एक समान नहीं होते। एक पल में हम मौज और मस्‍ती कर रहे होते हैं , तो दूसरे ही पल तमाम जिम्‍मेदारियां मुंह बाये खडी होती है , तीसरे ही पल किसी न किसी प्रकार का तनाव हमारे जीवन में आ जाता है। पर्याप्‍त रिसर्च के अभाव में भले ही एक एक पल के इस सुखमय और दुखमय समय के बारे में पहले से जानना कठिन हो , पर ये माहौल गोचर के ग्रहों की स्थिति से ही जन्‍म लेती है। शनि के कारण आप ढाई वर्षों तक किसी समस्‍या से निरंतर जूझ सकते हैं , जबकि बृहस्‍पति की स्थिति से एक वर्ष तक , एक छोटा सा चंद्रमा हमें ढाई दिनों तक परेशान कर सकता है तथा आसमान की अन्‍य स्थिति पर हम ध्‍यान दें तो एक एक घटी और पल के सुख दुख का अनुमान लगाया जा सकता है।

इस तरह भले ही जीवन भर प्राप्‍त सुख दुख और दीर्घकालीन उतार चढाव हम अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्त करते हों, परछोटी छोटी अवधि में आनेवाली बाधाएं गोचर के ग्रहों पर आधारित होती हैं और इसलिए भविष्‍य कथन में इनका ध्‍यान रखना आवश्‍यक होता है। जैसे जन्‍मकालीन ग्रहों की स्थिति के आधार पर किसी युवक या युवति के वैवाहिक संदर्भों में कोई कठिनाई न हो , तो विवाह मनोनुकूल स्‍थान में होने की पूरी संभावना रहेगी , पर कभी कभी विवाह में खासी समस्‍याएं आ जाती हैं। या तो विवाह में देर होती है या फिर कोई दूसरी समस्‍या। ऐसा इसलिए होता है क्‍यूंकि जब वो या उनके अभिभावक विवाह के लिए गंभीर हुए , वैवाहिक मामलों के लिए जिम्‍मेदार कोई ग्रह गोचर में अच्‍छी स्थिति में न चल रहा होता है। गोचर के ग्रह कभी कभी छह सात वर्षों तक किसी प्रकार की बाधा उपस्थित करने में जिम्‍मेदार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में जन्‍मकालीन ग्रहों के आधार पर हमारे द्वारा बनाया जानेवाला जातक का जीवनग्राफ भी काम नहीं करते देखा जाता है। यही कारण है कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' गोचर के ग्रहों को बहुत महत्‍व देता है।

Wednesday, 25 August 2010

जन्‍मकुंडली में सर्वाधिक महत्‍व लग्‍न का होता है !!

पुराने लेखों में मैने बताया ही है कि जन्‍मकुंडली में सर्वाधिक महत्‍व लग्‍न यानि पूर्वी क्षितिज में उदित होनेवाली राशि का होता है । लग्‍न के सापेक्ष सभी ग्रहों की स्थिति ही एक जातक की परिस्थितियां भिन्‍न होती हैं और उनके के सोंचने का ढंग भी अलग होता है । लग्‍न की जानकारी के लिए हमारे पंचांगों में एक चार्ट होता है , जिसमें बच्‍चे के जन्‍म तिथि , जन्‍मसमय और जन्‍मस्‍थान के आधार पर उसके लग्‍न की जानकारी हो जाती है। आज तो किसी जातक का लग्‍न निकालने के लिए बहुत सुविधा हो गयी है। इंटरनेट में भी आप किसी बच्‍चे के लग्‍न की जानकारी के लिए कई लिंकों पर जा सकते हैं , यहां और यहां । जन्‍म के शहर के लांगिच्‍यूड और लैटिच्‍यूड के लिए आप इस लिंक पर भी जा सकते हैं।

पूर्व के लेखों में बताया गया है कि सूर्य प्रत्‍येक राशि में एक एक महीने महीने भ्रमण करता हुआ सौरवर्ष के अंत में पुन: उसी स्‍थान पर आ जाता है। इस सूर्य और जन्‍म समय के आधार पर हम मोटा मोटी तौर पर किसी बच्‍चे के जन्‍म लग्‍न का अनुमान भी कर सकते हैं। 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य सूर्य मेष राशि में होता है , इसलिए उस समय सूर्योदय के आसपास जन्‍म लेने वाला मेष लग्‍न में ही होगा , क्रमश: दो दो घंटे बाद लग्‍न परिवर्तित होता जाता है , इसलिए लगभग दो दो घंटे बाद जन्‍मलेने वाले बच्‍चे अगले लग्‍न में आते चले जाएंगे। इस माह मध्‍य दोपहर में जन्‍म लेनेवाला बच्‍चा कर्क लग्‍न में तथा सूर्यास्‍त के समय जन्‍म लेनेवाला बच्‍चे का जन्‍म मेष के ठीक सामने वाली राशि में यानि तुला लग्‍न में होगा। इसी प्रकार मध्‍य रात्रि में जन्‍म लेनेवाला बच्‍चे का लग्‍न मकर होगा।

इसी प्रकार सूर्य के वृष  राशि में होने के वक्‍त यानि 15 मई से 15 जून के मध्‍य सूर्योदय के आसपास जन्‍म लेनेवाला बालक वृष लग्‍न में जन्‍म लेगा , दो दो घंटे बाद जन्‍मलेनेवालों के लग्‍न आगे बढते चले जाएंगे और दो पहर के मध्‍य जन्‍म लेनेवाला सिंह लग्‍न में , सूर्यास्‍त के वक्‍त जन्‍म लेनेवाला वृश्चिक में तथा मध्‍य रात्रि को ज्न्‍म लेनेवाले का जन्‍म कुंभ लग्‍न में होगा। इसी प्रकार आगे के महीनों में सूर्य के राशि परिवर्तन के बाद यह चक्र बढता चला जाएगा। इस आधार पर आप मोटा मोटी तौर पर जातक के लग्‍न की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं। मैने बारहो महीनों के लग्‍न चार्ट को एक छोटे से ग्राफ पेपर में भी समेटा है , उसके आधार पर भी आप किसी भी व्‍यक्ति की जन्‍म तिथि , जन्‍मसमय और स्‍थानीय समय के आधार पर जातक के लग्‍न का पता कर सकते हैं।

Monday, 23 August 2010

जन्‍मकालीन ग्रहों के अलावे गोचर में चलनेवाले ग्रहों की शक्ति कोभी देखा जाना चाहिए !!

पिछले दो आलेखों में मैने लिखा कि किसी भी जन्‍मकुंडली से जातक के जीवन के विभिन्‍न पक्षों के बारे में स्‍थायी रूप से जानने के लिए उस भाव के भावेश तथा उसमें स्थित ग्रहों का ध्‍यान रखना आवश्‍यक होता है। इस हिसाब से संलग्‍न जन्‍मकुंडली में जातक के स्‍वास्‍थ्‍य के मामलों को देखने के लिए हमें सूर्य की स्थिति और शक्ति पर ध्‍यान देना होगा। इसी प्रकार धन विषयक मामलों को जानने के लिए बुध ग्रह की शक्ति और स्थिति को , भाई बंधु की स्थिति को जानने के लिए शुक्र की स्थिति और शक्ति की जानकारीआवश्‍यक होगी।इसी प्रकार हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति का आकलन करने के लिए मंगल की स्थिति भी महत्‍वपूर्ण होगी। 


अब चूंकि बुद्धि ज्ञान और संतान के भाव का स्‍वामी बृहस्‍पति है , जबकि वहां चंद्रमा की भी स्थिति है , इसलिए बुद्धि और संतान की स्थिति को जानने के लिए बृहस्‍पति के साथ साथ चंद्र की स्थिति और शक्ति को जानना अनिवार्य है। इसी प्रकार अष्‍टम भाव यानि जीवनशैली की जानकारी के लिए बृहस्‍पति के साथ ही साथ शनि की शक्ति और स्थिति की जानकारी आवश्‍यक होगी। घर गृहस्‍थी और झंझट की स्थिति को समझने के लिए भी शनि की शक्ति और स्थिति को देखना भाग्‍य को जानने के लिए मंगल के साथ साथ सूर्य और बुध की शक्ति को समझना आवश्‍यक है ।


इसी प्रकार पिता या सामाजिक राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए शुक्र तथा लाभ से संबंधित मामलों के लिए बुध की शक्ति और स्थिति को देखना आवश्‍यक होगा। खर्च और बाहरी संदर्भों की जानकारी के लिए चंद्र के साथ ही साथ बृहस्‍पति की भी स्थिति और शक्ति की जानकारी आवश्‍यक होगी। जन्‍मकालीन ग्रहों की शक्ति और स्थिति से संदर्भों के जीवनभर की स्थिति का पता चलेगा , जबकि अस्‍थायी रूप से आनेवाली समस्‍याओं के लिए गोचर के चाल पर भी ध्‍यान रखना आवश्‍यक है।



'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार जन्‍मकालीन ग्रहों के अलावे गोचर के ग्रह भी जातक के विभिन्‍न संदर्भों को प्रभावित करते हैं , इसलिए पंचांग के अनुसार ग्रहों की हर समय की स्थिति को जानना एक ज्‍योतिषी के लिए अनिवार्य है , गोचर में विभिन्‍न राशियों में स्थित विभिन्‍न ग्रह जिस भाव के स्‍वामी होते हैं  और जिस भाव में स्थित होते हैं , उससे संबंधित अच्‍छे या बुरे फल प्रदान करते हैं , इसके लिए गोचर में चलनेवाले ग्रहों की शक्ति कोभी देखा जाना चाहिए।

Saturday, 21 August 2010

विभिन्‍न लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों के लिए भिन्‍न भिन्‍न ग्रह जिम्‍मेदार होते हैं !!

पिछले पोस्‍ट में आपने देखा कि  पर यदि तुला लग्‍न की सारी कुंडलियों की बात की जाए , तो इनमें निम्‍न ग्रहों के सहारे निम्‍न पक्षों की भविष्‍यवाणी की जा सकती है .....
चंद्र के सहारे पिता व सामाजिक स्थिति,
सूर्य के सहारे लाभ और लक्ष्‍य,
बुध के सहारे भाग्‍य और खर्च,
शुक्र के सहारे शरीर और जीवनशैली ,
मंगल के सहारे धन और घर गृहस्‍थी,
बृहस्‍पति के सहारे भाई बंधु और झंझट ,
शनि के सहारे संपत्ति , बुद्धि और संतान ।
इसी आधार पर  सभी लग्‍नवालों के अलग अलग पक्ष को देखने के लिए अलग अलग ग्रहों की शक्ति पर नजर रखनी पडती है ।

मेष लग्‍नवालों की कुंडली में चंद्र से माता , हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , बुध से भाई बंधु और झंझट से जूझने की शक्ति , मंगल से शरीर, व्‍यक्तित्‍व और जीवनशैली , शुक्र से धन और घर गृहस्‍थी , सूर्य से बुद्धि ज्ञान और संतान , बृहस्‍पति से भाग्‍य , खर्च और बाहरी संदर्भ तथा शनि से पिता , पद प्रतिष्‍ठा और लाभ देखा जाता है।

इसी प्रकार वृष लग्‍नवालों की कुंडली में चंद्र से भाई बंधु , बुध से धन और बुद्धि , ज्ञान , मंगल से घर गृहस्‍थी और खर्च , शुक्र से शरीर व्‍यक्तित्‍व और संघर्ष क्षमता , सूर्य से हर प्रकार कर संपत्ति , बृहस्‍पति से जीवनशैली और लाभ तथा शनि से पिता , पद प्रतिष्‍ठा और भाग्‍य की स्थिति देखी जाती है।

मिथुन लग्‍नवालों की कुंडली में चंद्र से धन की स्थिति , बुध से शरीर , माता और हर प्रकार की संपत्ति , मंगल से लाभ और रोग , ऋण , शत्रु जैसे झंझट , शुक्र से घर गृहस्‍थी , खर्च और बाहरी संदर्भ , सूर्य से भाई बंधु , बृहस्‍पति से पिता , पद प्रतिष्‍ठा का वातावरण और घर गृहस्‍थी तथा शनि से भाग्‍य और जीवन शैली से संबंधित मामले देखे जाते हैं।

कर्क लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से स्‍वास्‍थ्‍य , बुध से भाई बंधु और खर्च , मंगल से पिता , पद प्रतिष्‍ठा , बुद्धि ज्ञान और संतान , शुक्र से हर प्रकार की संपत्ति और लाभ , सूर्य से धन , बृहस्‍पति से हर प्रकार के झंझट और भाग्‍य तथा शनि से घर गृहस्‍थी और जीवनशैली की स्‍िथति देखी जाती है।

सिंह लग्‍नवाले की जन्‍मकुंडली में चंद्र से खर्च और बाहरी संदर्भों , बुध से धन और लाभ, मंगल से हर प्रकार की संपत्ति और भाग्‍य की स्थिति , शुक्र से भाई बंधु और पद प्रतिष्‍ठा , सूर्य से स्‍वास्‍थ्‍य , बृहस्‍पति से संतान , बुद्धि ज्ञान और जीवन शैली तथा शनि से घर गृहस्‍थी का वातावरण देखा जाता है।

कन्‍या लग्‍न वालें की जन्‍मकुंडली में चंद्र से लाभ , बुध से शरीर , व्‍यक्तित्‍व , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा , मंगल से भाई बंधु और जीवनशैली , शुक्र से धन और भाग्‍य , सूर्य से खर्च और बाहरी संदर्भ , बृहस्‍पति से माता , हर प्रकार की संपत्ति और घर गृहस्‍थी तथा शनि से बुद्धिज्ञान , संतान और प्रभाव की स्थिति देखी जाती है।

वृश्चिक लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से भाग्‍य , बुध से लाभ और जीवनशैली , मंगल से स्‍वास्‍थ्‍य और प्रभाव , शुक्र से घर गृहस्‍थी और जीवनशैली , सूर्य से पद प्रतिष्‍ठा का वातावरण , बृहस्‍पति से धन , बुद्धि और संतान पक्ष तथा शनि से भाई बंधु , माता और हर प्रकार की संपत्ति देखे जाते हैं।

धनु लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडलीमें चंद्र से जीवनशैली , बुध से घर गृहस्‍थी , पिता और प्रतिष्‍ठा का वातावरण , मंगल से बुद्धि ज्ञान , संतान , खर्च और बाह्य संदर्भ , शुक्र से लाभ और झंझट , सूर्य से भाग्‍य , बृहस्‍पति से स्‍वास्‍थ्‍य , माता , हर प्रकार की संपत्ति तथा शनि से भाई बंधु और धन की स्थिति देखी जाती है।

 मकर लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से घर गृहस्‍थी , बुध से भाग्‍य और प्रभाव , मंगल से हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति और लाभ , शुक्र से बंद्धि ज्ञान , संतान , पिता और पद प्रतिष्‍ठा , सूर्य से जीवनशैली , बृहस्‍पति से भाई बंधु , खर्च और बाह्य संदर्भ तथा शनि से स्‍वास्‍थ्‍य और धन की स्थि‍ति देखी जाती है।

कुंभ लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से झंझट , बुध से बुद्धि , ज्ञान , संतान , जीवनशैली ,  मंगल से भाई बंधु ,‍िपता और पद प्रतिष्‍ठा का वातवरण , शुक्र से भाग्‍य और हर प्रकार की छोटी बडी अचल संपत्ति , सूर्य से घर गृहस्‍थी का वातावरण , बृहस्‍पति से धन और लाभ की स्थिति तथा शनि से स्‍वास्‍थ्‍य और खर्च की स्थिति देखी जाती है।

इसी प्रकार मीन लग्‍न की जन्‍मकुंडली में चंद्र से बुद्धि ज्ञान और संतान की स्थिति , बुध से माता , हर प्रकार की संपत्ति और घर गृहस्‍थी की स्थिति , मंगल से धन और भाग्‍य की स्थिति , शुक्र से भाई बंधु और जीवन की स्थिति , सूर्य से हर प्रकार के झंझट , बृहस्‍पति से स्‍वास्‍थ्‍य , पिता और पद प्रतिष्‍ठा की स्थिति तथा शनि से लाभ और खर्च की स्थिति का आकलन किया जाता है।

विभिन्‍न संदर्भों की परिस्थितियों के निर्माण में उस भाव के स्‍वामी , जिसकी चर्चा ऊपर हुई है , की मुख्‍य भूमिका होने के अलावे उस भाव में मौजूद ग्रहों की भी आंशिक भूमिका होती है , इसलिए उनकी शक्ति का भी अध्‍ययन किया जाना आवश्‍यक होता है। इसलिए जन्‍मकुंडली के किसी भाव को समझने के लिए उस भाव के स्‍वामी और वहां स्थित ग्रहों पर नजर रखनी चाहिए , बाकी ग्रहों की भूमिका उसके बाद ही होती है।

Saturday, 14 August 2010

जन्‍मकुंडली से जातक के प्रत्‍येक पक्ष की जानकारी हमें कैसे प्राप्‍त हो सकती है ??

पिछले आलेख में मैने बताया था कि विभिन्‍न भावों में लिखे अंक के स्‍वामी ग्रह जातक के उस पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करने वाले होते हैं। जातक की जन्‍मकुंडली के हिसाब से विभिन्‍न पक्षों का आकलन करने के लिए हमें उस भाव के स्‍वामी ग्रह के अतिरिक्‍त उसमें स्थित ग्रहों को भी ध्‍यान में रखना पडता है। अब नीचे दिए गए चित्र को देखिए ....



  उपरोक्‍त जन्‍मकुंडली तुला लग्‍न की है , पहले भाव में 7 अंकित है , इसका अर्थ है कि जातक के शरीर और व्‍यक्तित्‍व से संबंधित मामलों की जानकारी के लिए 7 अंक यानि तुला राशि के स्‍वामी यानि शुक्र की शक्ति की जानकारी आवश्‍यक है।
दूसरे भाव में 8 अंकित है , इसका अर्थ यह है कि जातक के धन विषयक मामलों को जानने के लिए 8 अंक यानि वृश्चिक राशि के स्‍वामी यानि मंगल की शक्ति जानकारी आवश्‍यक है।
तीसरे भाव में 9 अंकित है  जिसका अर्थ यह है कि जातक के भाईबंधु विषयक मामलों को जानने के लिए 9 अंक यानि धनुराशि के स्‍वामी यानि बृहस्‍पति की शक्ति का ज्ञान आवश्‍यक है।
चतुर्थ भाव में 10 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के संपत्ति विषयक मामलों को जानने के लिए 10 अंक यानि मकर राशि के स्‍वामी शनि की शक्ति का ज्ञान आवश्‍यक है।
पंचम भाव में 11 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के बुद्धि और संतान विषयक मामलों को प्रभावित करनेवाला ग्रह 11 अंक यानि कुंभ राशि का स्‍वामी शनि है और शनि की शक्ति से इसका आकलन किया जा सकता है।
षष्‍ठ भाव में 12 अंकित होने का अर्थ है कि जातक के झंझट विषयक मामलों को जानने के लिए 12 अंक यानि मीन राशि के स्‍वामी बृहस्‍पति की शक्ति को जानना आवश्‍यक है।
सप्‍तम भाव में 1 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक की घर गृहस्‍थी विषयक मामलों को जानने के लिए 1 अंक यानि मेष राशि के स्‍वामी मंगल की शक्ति को ध्‍यान दिया जाए।
अष्‍टम भाव में 2 अंकित होने का अर्थ है कि उसकी जीवनशैली को देखने के लिए 2 अंक यानि वृष के स्‍वामी शुक्र की शक्ति पर भी गौर किया जाए।
नवम् भाव में 3 अंकित होने का अर्थ है कि जातक के भाग्‍य विषयक मामलों की जानकारी के लिए 3 अंक यानि मिथुन राशि के स्‍वामी बुध की शक्ति की जानकारी आवश्‍यक है।
दशम भाव में 4 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के पिता या सामाजिक मामलों को जानने के लिए 4 अंक यानि कर्क राशि  के स्‍वामी चंद्र की शक्ति को जानना आवश्‍यक है।
एकादश भाव में 5 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के लाभ और लक्ष्‍य को समझने के लिए 5 अंक यानि सिंह राशि के स्‍वामी सूर्य की स्थिति को जानना आवश्‍यक है।
द्वादश भाव में 6 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के खर्च या बाहरी संदर्भों को देखने के लिए 6 अंक यानि कन्‍या राशि के स्‍वामी बुध की शक्ति को समझना आवश्‍यक है।

जातक के जीवन के सभी पक्षों को देखने के लिए संबंधित उपरोक्‍त ग्रहों के अलावे इस जन्‍मकुंडली में अन्‍य बातों का भी ध्‍यान रखना पडेगा। चूंकि पहले भाव में मंगल , दूसरे में बुध , तीसरे में सूर्य , चौथे में शुक्र , पांचवे शनि , आठवें बृहस्‍पति तथा नवें में चंद्र की स्थिति है। इसलिए इस जन्‍मकुंडली में शरीर की स्थिति को समझने में मंगल का , धन की स्थिति को समझने में बुध का , भाई बंधु की स्थिति को समझने में सूर्य का , संपत्ति की स्थिति को समझने में शुक्र का , जीवनशैली की स्थिति को समझने में बृहस्‍पति का तथा भाग्‍य की स्थिति को समझने में च्रद का भी आंशिक महत्‍व होगा । पर यदि तुला लग्‍न की सारी कुंडलियों की बात की जाए , तो इनमें निम्‍न ग्रहों के सहारे निम्‍न पक्षों की भविष्‍यवाणी की जा सकती है .....
चंद्र के सहारे पिता व सामाजिक स्थिति,
सूर्य के सहारे लाभ और लक्ष्‍य,
बुध के सहारे भाग्‍य और खर्च,
शुक्र के सहारे शरीर और जीवनशैली ,
मंगल के सहारे धन और घर गृहस्‍थी,
बृहस्‍पति के सहारे भाई बंधु और झंझट ,
शनि के सहारे संपत्ति , बुद्धि और संतान !!

Sunday, 8 August 2010

किसी जन्‍मकुंडली में किस किस खाने से क्‍या क्‍या देखा जाता है ??

पिछले सारे लेखों में हमने समझा कि एक छोटी सी जन्‍मकुंडली किस प्रकार जातक के जन्‍म के समय आसमान के पूरे 360 डिग्री और उसमें स्थित सभी ग्रहों को स्‍पष्‍ट करती है। एक छोटे से चित्र में इतनी बातों को समाविष्‍ट कर उस व्‍यक्ति के जन्‍म के समय आसमान की पूरी स्थिति को समझने में सफलता प्राप्‍त करना ऋषि मुनियों की दूरदर्शिता ही थी। पर ये तो ज्‍योतिष विज्ञान के लिए भविष्‍यवाणी करते वक्‍त इनपुट लेने जैसा है। जैसा कि वैज्ञानिक दृष्टि वाले समझते हैं , ज्‍योतिष का अंत यहीं पर हैं , बिल्‍कुल गलत है। आसमान के ग्रहों की स्थिति को देखकर जातक के भविष्‍य के बारे में , उसकी आगे की जीवनयात्रा के बारे में , उसके सभी संदर्भों के सुख दुख के बारे में आकलन करना ही ज्‍योतिष का मुख्‍य लक्ष्‍य है , जिसके लिए हमें फलित ज्‍योतिष के नियमों को सीखने की आवश्‍यकता पडती है। नीचे दिए गए चित्र से समझा जा सकता है कि ज्‍योतिष भविष्‍यवाणी करने में किस प्रकार समर्थ हो पाता है ??
जन्‍मकुंडली में जितने भी खाने होते हैं , वे मनुष्‍य के जीवन के एक एक पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। किस खाने में कौन सा नंबर लिखा है और किस खाने में कौन से ग्रह बैठे हैं , इसपर पहले  ध्‍यान देने की कोई आवश्‍यकता नहीं , लग्‍न वाले खाने को पहला और उसके बाद के  खाने की ओर बढते हुए हर खाने को क्रमश: दूसरा , तीसरा , चौथा भाव समझते हुए आगे बढते जाए। आप पाएंगे कि लग्‍नवाले खाने से सटा दाहिने ओर का खाना बारहवां भाव होगा। ये बारहो भाव क्रमश: व्‍यक्तित्‍व , संसाधन , शक्ति , स्‍थायित्‍व , ज्ञान , झंझट , गृहस्‍थी , जीवनशैली , भाग्‍य , सामाजिकता , लाभ और खर्च से संबंधित होते हैं। किसी की जन्‍मकुंडली देखकर उनके इन संदर्भों को जानने के लिए इन भावों को समझते हुए इसमें स्थित अंकों और ग्रहों को देखने की आवश्‍यकता होती है।

विभिन्‍न भावों में लिखे अंक के स्‍वामी ग्रह जातक के उस पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करने वाले होते हैं। जैसे मेष लग्‍नवालों के लिए शरीर और जीवन का स्‍वामी मंगल( क्‍यूंकि मंगल मेष और बृश्चिक राशि का स्‍वामी है) , धन और गृहस्‍थी का स्‍वामी शुक्र( क्‍यूंकि शुक्र वृष और तुला राशि का स्‍वामी है) , भाई और झंझट का स्‍वामी बुध( क्‍यूंकि बुध मिथुन और कन्‍या राशि का स्‍वामी है) , स्‍थायित्‍व का स्‍वामी चंद्रमा( क्‍यूंकि चंद्रमा कर्क राशि का स्‍वामी है) , ज्ञान का स्‍वामी सूर्य( क्‍यूंकि सूर्य सिंह राशि का स्‍वामी है) , भाग्‍य और खर्च का स्‍वामी बृहस्‍पति( क्‍यूंकि बृहस्‍पति धनु और मीन राशि का स्‍वामी है) तथा प्रतिष्‍ठा और लाभ का स्‍वामी शनि( क्‍यूंकि शनि मकर और कुभ राशि का स्‍वामी है) होता है। इसलिए जातक के उन पक्षों की भविष्‍यवाणी करने के लिए मुख्‍यत: इन्‍हीं ग्रहों की शक्ति को देखना आवश्‍यक होता है। चूंकि पूर्वी क्षितिज में परिवर्तन होता रहता है और हर वक्‍त अलग अलग लग्‍न का उदय होता है , इसलिए दूसरे लग्‍नवालों की कुडलियों में सभी संदर्भों को प्रभावित करने वाले ग्रह बदल जाते हैं। इसके अलावे संबंधित भाव में जो ग्रह होते हैं , वे भी उन संदर्भों में खास प्रकार के वातावरण को बनाने में सहायक होते हैं। तो जातक की जन्‍मकुंडली के हिसाब से विभिन्‍न पक्षों का आकलन करने के लिए हमें उस भाव के स्‍वामी ग्रह के अतिरिक्‍त उसमें स्थित ग्रहों को भी ध्‍यान में रखना पडता है।

Friday, 6 August 2010

कुंडली में ग्रहों का स्‍वक्षेत्री होना क्‍या है ??

जैसा कि मैने पहले ही एक आलेख में लिखा है , ज्‍योतिष शास्‍त्र में आसमान के पूरब से पश्चिम की ओर जाती गोल चौडी 360 डिग्री की पट्टी को 30-30 डिग्री के 12 भागों में बांटा गया है और एक एक राशि निकाली गयी है। 30-30 डिग्रियों के रूप में राशि का विभाजन यूं ही नहीं किया गया है , प्राचीन ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में चर्चा है कि इन 30-30 डिग्रियों तक आसमान से परावर्तित होने वाली किरणों का रंग एक जैसा है , हालांकि इसे प्रमाणित कर पाने में अभी या तो हमारा ज्ञान पर्याप्‍त नहीं हैं या फिर हमारे पास वैसे कोई साधन नहीं हैं।

परंपरागत ज्‍योतिष के अनुसार मेष और वृश्चिक राशि लाल रंग परावर्तित करते हैं , बिल्‍कुल वैसा जैसा मंगल ग्रह से परावर्तित होता है। इसी प्रकार वृष और तुला राशि से चमकीला सफेद , जैसा शुक्र ग्रह से परावर्तित होता है। मिथुन और कन्‍या से बुध की तरह हरे रंग का , कर्क से चंद्रमा की तरह दूधिया रंग का , सिंह से सूर्य की तरह लाल रंग परावर्तित होता है। इसी प्रकार धनु और मीन राशि से बृहस्‍पति की तरह पीला रंग और मकर और कुंभ राशि से शनि की तरह गाढा नीले रंग के परावर्तित होते किरणों की चर्चा की गयी है।

इसी आधार पर मेष और वृश्चिक राशि का स्‍वामीत्‍व मंगल को , वृष और तुला राशि का स्‍वामीत्‍व शुक्र को , मिथुन और कर्क राशि का स्‍वामीत्‍व बुध को , सिंह राशि का स्‍वामीत्‍व सूर्य को , धनु और मीन राशि का स्‍वामीत्‍व बृहस्‍पति को तथा मकर और कुंभ राशि का स्‍वामीत्‍व शनि को दिया गया है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इस तथ्‍य के अनुसार भविष्‍यवाणियां करने में कोई खामी नहीं पायी है , इसलिए इसकी प्रामाणिकता पर इसे कोई संदेह नहीं है। इसे तो ताज्‍जुब इस बात का है कि संसाधन विहीनता के मध्‍य हमारे पूर्वजों के अनुसंधान में इतने सारे तथ्‍य किस प्रकार जुड गए ??

यही कारण है कि कुंडली में मेष और वृश्चिक राशि में मंगल के होने से , वृष और तुला राशि में शुक्र के होने से , मिथुन और कन्‍या राशि में बुध के होने से , कर्क राशि में चंद्र के होने से , धनु और मीन राशि में बृहस्‍पति के होने से तथा मकर और कुंभ राशि में शनि के होने से इन ग्रहों को स्‍वक्षेत्री माना जाता है। परंपरागत ज्‍योतिष स्‍वक्षेत्री ग्रहों को बहुत ही महत्‍वपूर्ण मानता है , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार स्‍वक्षेत्री ग्रह भी अपनी गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति के हिसाब से ही अच्‍छा या बुरा फल देते हैं। हां , यह बात अवश्‍य है कि वे अपनी खुद की राशि में होते हैं , इसलिए उसके कमजोर या मजबूत होने से दूसरे पक्षों पर बहुत फर्क नहीं पडता है।  किसी मजबूत ग्रह के भाव में कमजोर ग्रह चले जाते हैं , तो उसका बुरा प्रभाव अधिक विकट होता है।

Wednesday, 4 August 2010

कालसर्प योग की भयावहता पर स्‍वयमेव ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग जाता है!!

इधर हाल के वर्षों में जिस ज्‍योतिषीय योग से लोग सर्वाधिक भयभीत हुआ करते हैं , वह है कालसर्पयोग। कालसर्पयोग ने आमजन में शनि , राहू और केतु से भी अधिक भय पैदा किया है। आसमान में राहू और केतु की स्थिति हमेशा आमने सामने यानि 180 डिग्री पर होती है। जब सभी ग्रह इसके मध्‍य आ जाते हैं, तो उस स्थिति में बननेवाली कुंडली में कालसर्पयोग माना जाता है। वैसे तो 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' राहू और केतु के अस्तित्‍व को नहीं स्‍वीकारता , पर इस नियम के तहत् किसी भी कुंडली को देखने पर जब सारे ग्रह एक ओर दिखाई दें तो उस कुंडली में कालसर्पयोग माना जा सकता है। यहां तक कि नियमानुसार चंद्रमा यदि 180 डिग्री के अंदर न होकर उससे बाहर भी हो , तो भी कुंडली में काल सर्पयोग माना जाता है।

अभी आसमान में केतु मिथुन राशि में और राहू धनु राशि में चल रहा है। इसलिए इनके मध्‍य और सारे ग्रह भले ही आ जाएं , पर सौरमंडल के दूरस्‍थ ग्रह शनि और बृहस्‍पति में से दोनो नहीं आ सकते , क्‍यूंकि अभी शनि कन्‍या राशि में और बृहस्‍पति मीन राशि में यानि ये दोनो भी आमने सामने चल रहे हैं, इसलिए एक ओर आ ही नहीं सकते। सौरमंडल में सूर्य के निकट स्थित ग्रह बुध , मंगल , शुक्र आदि तो हमेशा साथ साथ होते ही हैं , इसलिए ये राहू और केतु के एक ओर हो सकते हैं , पर शनि और बृहस्‍पति के एक दूसरे के विपरीत होने के कारण अभी यानि 2010 में जन्‍म लेनेवाले किसी भी बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में कालसर्पयोग नहीं बन सकता। इससे पहले भी 2007 , 2008 , 2009 में जन्‍म लेनेवाले किसी बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में भी यह योग नहीं बना , क्‍यूंकि यहां भी बृहस्‍पति और शनि में से दोनो ग्रह राहू और केतु के मध्‍य नहीं थे।

यदि चार पाचं वर्ष पूर्व चले जाएं , जब बृहस्‍पति वृश्चिक या तुला राशि में था और शनि कर्क में , और दोनो ग्रह राहू और केतु क्रमश: तुला और मेष में , तो ये दोनो ग्रह वर्षभर एक ओर ही होते थे। वर्ष में छह महीने इनके मध्‍य ही अन्‍य सभी ग्रहों को भी होना ही था। हां , यदि चंद्रमा को छोडकर कालसर्पयोग की परिभाषा रची जाए , तो भले ही छह महीनों में से पंद्रह दिनों तक चंद्रमा के दूसरी ओर होने से कालसर्पयोग न बन पाए , लेकिन बृहस्‍पति और शनि जिस वर्ष राहू और केतु के मध्‍य फंसे हों , उस वर्ष चंदमा को छोड देने से छह महीने तक लगातार जन्‍म लेने वाले बच्‍चों की जन्‍मकुंडली में कालसर्पयोग होगा। यदि चंद्रमा पर भी ध्‍यान दिया जाए तो भले ही छह महीनों तक पंद्रह दिनों तक जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे कालसर्पयोग में जन्‍म नहीं लेंगे। लेकिन अगले पंद्रह दिनों तक जनम लेनेवाले सारे बच्‍चे पुन: इसी योग में पडेंगे। हां , वर्ष के छह महीनों में जन्‍म लेनेवालों की कुंडली में यह योग नहीं देखा जा सकता है , क्‍यूंकि बृहस्‍पति और शनि तो सौरमंडल में एक ही ओर होते हैं , जबकि सूर्य , बुध , शुक्र और मंगल वर्षभर में लगभग पूरे 360 डिग्री का चककर लगा लेते हैं।

ऐसा किसी एक वर्ष में नहीं  , लगातार चार वर्षों तक जबतक बृहस्‍पति और शनि दोनो आसमान के एक ओर न हो जाएं , आसमान में छह महीनों तक ऐसी स्थिति बनती ही रहती है , जिस समय जन्‍मलेनेवालों की कुंडली में कालसर्प योग बन सके। बस एक चंद्रमा की स्थिति अंदर और बाहर होती रहती है। इसका अर्थ यह है कि किसी खास वर्ष में या लगातार कई वर्षों तक जन्‍म लेनेवाले 50 प्रतिशत बच्‍चे या कम से कम 25 प्रतिशत बच्‍चे की कुंडली में संपूर्ण कालसर्प योग हो सकता है। जबकि ऐसा नहीं है कि खास वर्षों में खास समयांतराल में सिर्फ अमीर या गरीब घर में या अमीर या गरीब देश में ही बच्‍चे जन्‍म लेते हैं। दुनिया में असामान्‍य परिस्थिति में जीवनयापन करने वाले का प्रतिशत बहुत सामान्‍य होता है। अब जब यह योग इतना सामान्‍य है तो इसकी भयावहता पर स्‍वयमेव ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग जाता है।

Friday, 23 July 2010

लग्‍नकुंडली से जानें .. जातक मंगला है या नहीं ??

हमारे समाज में ज्‍योतिष को माननेवालों के मध्‍य विवाह के समय मंगला मंगली की चर्चा खूब होती है। लग्‍नकुंडली से आप समझ सकते हैं कि जातक मंगला है या नहीं। नीचे की जन्‍मकुंडली में वक्र रेखा AB पांच खानों से होकर गुजर रही है । लग्‍नकुंडली में यदि इन पांचों खानों में मंगल की स्थिति हो , तो जातक मंगला होते हैं।
इस जन्‍मकुंडली का जातक मंगला नहीं है .... 
इस जन्‍मकुंडली का जातक मंगला है ....
कुंडली में मंगला और मंगली कितने घातक होते हैं या यह बिल्‍कुल सामान्‍य अवस्‍था है , इसके बारे में जानकारी देते हुए मैं अपने ब्‍लॉग पर एक विस्‍तृत आलेख लिख चुकी हूं , उसे अवश्‍य पढें!!



Wednesday, 21 July 2010

मैने अभी तक राहू और केतु से आपका परिचय क्‍यूं नहीं करवाया ??

कुछ ही दिनों में इस ब्‍लॉग में कई आलेख पोस्‍ट किए जा चुके, लगभग सबमें सभी ग्रहों (जिसमें सूर्य नाम का तारा और चंद्र नाम का उपग्रह भी आ जाता है) की चर्चा हुई , पर किसी में भी राहू और केतु का उल्‍लेख नहीं किया गया।'परंपरागत ज्‍योतिष' बिना राहू और केतु को बैठाए न तो कुंडली निर्माण को पूर्ण मान सकता है और न ही बिना राहू और केतु के भविष्‍य फल कथन ही हो सकता है। पर आप सबों को यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' राहू और केतु को कोई ग्रह नहीं मानता। जब यह पिंड है ही नहीं , तो पृथ्‍वी के जड और चेतन को यह कैसे प्रभावित कर सकता है ??

वास्‍तव में राहू और केतु , जिन्‍हें फलित ज्‍योतिष में ग्रहों के रूप में जाना जाता है , का कोई अस्तित्‍व ही नहीं। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने पर विराट आकाश में सूर्य का एक दीर्घवृत्‍ताकार पथ बन जाता है। पृथ्‍वी के चारो ओर चंद्रमा के परिभ्रमण का एक वृत्‍ताकर पथ है ही। आसमान के खास डिग्री पर सूर्य और चंद्र दोनो के पथ एक दूसरे को काटते नजर आते हैं , जो विंदू उत्‍तर की ओर कटता है , वह राहू तथा जो विंदू दक्षिण की ओर कटता है , वो केतु कहलाता है। दोनो की कोणात्‍मक दूरी 180 डिग्री की होती है। सभी ग्रहों की तरह राहू और केतु की गति आगे बढने की न होकर सदैव पीछे की ओर खिसकने की होती है। राहू और केतु डेढ डेढ वर्ष में एक एक राशि पार करते हुए 18 वर्ष में सभी राशियों को उल्‍टी ओर से घूमते हुए पार कर लेते हैं। आसमान में एक दूसरे के 180 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी में रहने के कारण किसी भी जन्‍मकुंडली में राहू और केतु हमेशा आमने सामने होता है।

फलित ज्‍योतिष में राहू और केतु के इतना भयावह प्रभाव माने जाने की दीर्घकालीन चर्चा का कारण हमलोग सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के प्रभाव को मानते हैं। वास्‍तव में , दोनो ग्रहण के दौरान राहू और केतु नामक ये विशेष विंदू , सूर्य , चंद्र और पृथ्‍वी एक ही सीध में आ जाते हैं। ज्‍योतिष के विकास के बिल्‍कुल आरंभ में शायद ज्‍योतिषियों को यह जानकारी नहीं रही हो कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंड में पडने से ही सूर्य या चंद्रग्रहण होता होता है , इसका कारण ढूंढते वक्‍त ज्‍योतिषियों की नजर इन दोनो विंदूओं पर पडी हो। इन्‍होने पाया होगा कि दोनो ही ग्रहण के दौरान ये विंदू एक सीध में आ जाते हैं , बस ग्रहण का कारण इन्‍हे मान लिया होगा। बाद में इसके कारण ढूंढ लेने पर भी राहू और केतु लोगों के मनोमस्तिष्‍क से नहीं हट सके होंगे।

राहू और केतु आकाशीय पिंड नहीं हैं , इसलिए इन दोनो को संपात विंदू कहा गया है। भौतिक विज्ञान में ऊर्जा के विभिन्‍न प्रकारों में गति , ताप , प्रकाश , विद्यूत , चुंबक और ध्‍वनि का उल्‍लेख मिलता है। इनकी उत्‍पत्ति पदार्थ के बिना संभव नहीं है। इसके साथ ही सभी ऊर्जाएं एक दूसरे में आसानी से रूपांतरित की जा सकती है। हमलोग ग्रह की किस ऊर्जा से प्रभावित होते हैं ,  गुरूत्‍वाकर्षण , गति , किसी प्रकार के प्रकाश , किरण या फिर विद्युत चुंबकीय शक्ति । कह पाना तो अभी बहुत कठिन है , पर इतना अवश्‍य है कि शक्ति के जिस रूप से भी हम प्रभावित होते हों , राहू और केतु इनमें से किसी का उत्‍सर्जन नहीं करते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। इसलिए सूर्य , चंद्रमा एवं अन्‍य ग्रहों की शक्ति की चर्चा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' करता है , पर राहू और केतु की नहीं करता।

Monday, 19 July 2010

एक जन्‍मकुंडली को देखकर हम जातक के बारे में क्‍या क्‍या कह सकते हैं ??

किसी के जन्‍मांग चक्र या जन्‍मकुंडली को देखने से हमें जातक के बारे में बहुत जानकारियां मिल जाती है , ये रही एक व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली ...
  1. जन्‍मुकंडली में सबसे ऊपर मौजूद अंक हमें जातक के लग्‍न की जानकारी देता है , इस कुंडली में 5 अंक सिंह राशि का सूचक है , इसलिए जन्‍म लग्‍न सिंह हुआ , इसका अर्थ यह है कि जातक का जन्‍म उस वक्‍त हुआ , जब आसमान में 120 डिग्री से 150 डिग्री का उदय हो रहा था , जो भचक्र की पांचवी राशि है।
  2. चंद्रमा 9 अंक में मौजूद है , इसलिए चंद्रराशि धनु हुई।
  3. सूर्य 1 अंक में मौजूद है , इसलिए सूर्य राशि मेष हुई।
  4. सूर्य 1 अंक में है , इसका अर्थ यह भी है कि जातक का जन्‍म 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य हुआ है। 
  5. लग्‍न से चौथे खाने में मौजूद सूर्य से हमें यह जानकारी मिल रही है कि जातक का जन्‍म दोपहर बाद लगभग दो तीन बजे हुआ होगा।
  6. सूर्य से पहले चंद्र की स्थिति होने से हमें जानकारी मिल रही है कि जातक का जन्‍म कृष्‍ण पक्ष में हुआ है। 
  7. सूर्य से चार खाने चंद्रमा की स्थिति से मालूम हो रहा है कि जातक का जनम षष्‍ठी के आसपास का है।
  8. अभी शनि कन्‍या राशि में यानि 6 अंक में चल रहा है , जबकि जन्‍मकुंडली में 12 अंक में शनि है। इसका अर्थ यह है कि शनि ने अपना आधा या डेढ या ढाई या साढे तीन चक्र पूरा किया है। इस हिसाब से जातक का जन्‍म लगभग 15 वर्ष या 45 वर्ष या 75 वर्ष पहले हुआ होगा।
  9. अभी बृहस्‍पति मीन राशि में यानि 12 अंक में चल रहा है , जबकि जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति 4 अंक में है। इसका अर्थ यह है कि जातक का जन्‍म लगभग 8 या 20 या 32 या 44 या 56 या 68 या 80 वर्ष पहले हुआ है। 
  10. शनि और बृहस्‍पति दोनो की संभावना 44 के आसपास बनती है , इस हिसाब से जातक की उम्र 44 के आसपास होने का पता चल जाता है।
इसी प्रकार बिना पंचांग के ही अन्‍य जन्‍मकुंडली से भी जातक के बारे में ये दसों जानकारियां प्राप्‍त की जा सकती हैं , इसके लिए सभी पुराने आलेख पढें !!

Friday, 16 July 2010

शनि को एक एक राशि पार करने में ढाई वर्ष लगते हैं !!

सौरमंडल में सबसे अधिक दूरी पर स्थित ग्रह शनि को एक एक राशि पार करने में ढाई ढाई वर्ष लगते हैं और इस तरह वह लगभग 30 वर्षों में सभी राशियों की परिक्रमा कर लेता है। पिछले वर्ष यानि 2009 से शनि कन्‍या राशि में भ्रमण कर रहा है और 2011 के नवंबर में तुला राशि में चला जाएगा। इसी प्रकार लगभग ढाई ढाई वर्ष एक एक राशि में रहते हुए 2038 के  आसपास पुन: कन्‍या राशि में चलेगा। जन्‍मकुंडली में शनि की स्थिति को देखकर जातक के जन्‍म के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। हां , बृहस्‍पति की तरह यहां भी आप कुछ अंदाजा लगा कर आप एक निष्‍कर्ष पर पहुंच सकते हैं।

चूंकि आज शनि कन्‍या राशि में एक वर्ष तक चल चुका है , यदि किसी की जन्‍मकुंडली में 6 अंक में ही शनि है तो आप समझ सकते हैं कि जातक 30 , 60 या 90 के आसपास की उम्र का है और क्रमश: एक एक राशि को पार करता हुआ पूरा चक्र पार कर यहां तक आ चुका है। इसी प्रकार यदि शनि 5 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 3 , 33 ,63 या 93 वर्ष के लगभग पहले जन्‍म लिया है। इसी प्रकार शनि 4 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 6 , 36 , 66 , 96 वर्ष पहले जन्‍म लिया था। किसी के जन्‍म वर्ष को जानने के लिए शनि के अलावे उसकी जन्‍मकुंडली के बृहस्‍पति का भी सहारा लिया जा सकता है।

महीने की जानकारी में सूर्य की स्थिति मदद कर ही देती है और जन्‍मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति से आप तिथि तक पहुंच सकते हैं। इस क्षेत्र में जैसे जैसे अभ्‍यास बढता जाता है , सिर्फ जन्‍मकुंडली देखकर जातक के जन्‍म के बारे में सबकुछ जानने समझने में मदद मिलती जाती है। और इस तरह जन्‍मकुंडली नाम के इस छोटे से चक्र से न सिर्फ बालक की उम्र का पता चलता है , वरन् उसके जन्‍म के समय की आकाशीय स्थिति  , उसके जन्‍म का महीना, तिथि , प्रहर सबकुछ की जानकारी हमें मिल जाती है , ज्‍योतिष जैसे विषय में प्राचीनकाल की इतनी अच्‍छी व्‍यवस्‍था को देखकर आज भी मुझे बडी हैरत होती है।

Monday, 12 July 2010

बृहस्‍पति को एक एक राशि पार करने में एक वर्ष लगते हैं !!

जैसा कि पुराने लेखों से स्‍पष्‍ट हो चुका है कि पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से आसमान में पूरब से पश्चिम की ओर घूमती हुई जो पट्टी दिखती है , उस 360 डिग्री के 12 भाग कर देने से हमें 30-30 डिग्री की 12 राशियां मिलती हैं। सूर्य एक एक महीने में उसकी परिक्रमा करता है और उसी के साथ साथ बुध और शुक्र भी सभी राशियों को पार करने में पूरे साल लगा देते हैं। चंद्रमा ढाई ढाई दिनों में एक राशि को पार करते हुए पूरे चंद्रमास के दौरान सभी राशियों को पार कर जाता है। मंगल भी यदि वक्री गति में न हो , तो वर्षभर में सभी राशियों को पार कर लेता है।

सौरमंडल में अधिक दूरी पर स्थित ग्रह बृहस्‍पति को एक एक राशि पार करने में एक एक वर्ष लगते हैं और इस तरह वह 12 वर्षों में सभी राशियों की परिक्रमा कर लेता है। अभी यानि मई 2010 से बृहस्‍पति मीन राशि में भ्रमण कर रहा है और 2011 के मई में मेष राशि में चला जाएगा। इसी प्रकार लगभग एक एक वर्ष एक एक राशि में रहते हुए 2022 में पुन: मीन राशि में चलेगा।

जिस तरह किसी व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली में स्थित सूर्य को देखकर जातक के जन्‍म के महीने और जन्‍म के प्रहर का अनुमान तथा सूर्य से चंद्रमा की दूरी को देखने से चंद्रमा के आकार का अनुमान लगाया जा सकता है, , वैसा जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति की स्थिति को देखकर जातक के जन्‍म के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। हां , आप कुछ अंदाजा तो लगा ही सकते हैं। बाकी की कमी शनि की स्थिति को देखकर पूरी की जा सकती है। और इस तरह आप एक निष्‍कर्ष पर पहुंच सकते हैं।

चूंकि आज बृहस्‍पति मीन राशि में यानि 12 अंक में चल रहा है , यदि किसी की जन्‍मकुंडली में 12 अंक में बृहस्‍पति है तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 12 , 24 , 36 , 48 , 60 , 72 या 84 वर्ष पहले जन्‍म लिया है और क्रमश: एक एक राशि को पार करता हुआ पूरा चक्र पार कर यहां तक आ चुका है। इसी प्रकार यदि बृहस्‍पति 11 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 13 , 25 , 37 , 49 , 61 , 73 या 85 वर्ष पहले जन्‍म लिया है। इसी प्रकार बृहस्‍पति 10 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 14 , 26 , 38 , 50 , 62, 74 , या 86 वर्ष की उम्र का है। इसी प्रकार जन्‍मकुंडली की बृहस्‍पति और आज की बृहस्‍पति की स्थिति को देखते हुए जातक के उम्र का अंदाजा लगा सकते हैं।

Friday, 9 July 2010

जन्‍मकुंडली में भी अधिकांश समय बुध और शुक्र सूर्य के साथ साथ ही होते हैं !!

पिछले आलेखों में आपको जानकारी मिली थी कि पृथ्‍वी को स्थिर रखने से पूरे आसमान की 360 डिग्री को 12 भागों में बांटकर 12 राशियां बनायी गयी हैं। सूर्य एक एक राशि में एक महीने ठहरते हुए पूरे वर्ष में कुल 12 राशियों का चक्‍कर और चंद्रमा एक एक राशि में ढाई दिनों तक रहते हुए कुल 12 राशियों का चक्‍कर एक माह में लगाता है।

इसी प्रकार अन्‍य ग्रह भी नियमित तौर पर पूरे भचक्र का चक्‍कर लगाते हैं। चूंकि सौरमंडल में मंगल , बृहस्‍पति और शनि जैसे ग्रहों की स्थिति पृथ्‍वी के बाद होते हैं , इसलिए इनका सूर्य की गति से कोई संबंध नहीं होता , यही कारण है कि ये तीनो ग्रह आसमान में कहीं पर भी हो सकते हैं , यही कारण है कि जन्‍मकुंडली में ये 12 खाने में कहीं भी छितराये हो सकते हैं।

पर सौरमंडल में बुध और शुक्र .. ये दो ग्रह ऐसे हैं , जो सूर्य और पृथ्‍वी के मध्‍य स्थित होकर सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इस कारण पृथ्‍वी को स्थिर रखते हुए जब सभी ग्रहों की गति का अध्‍ययन होता है , तो वे अधिकांश समय सूर्य के साथ साथ ही देखे जाते हैं। सूर्य से अधिक निकट होने के कारण बुध सूर्य से अधिकतम 27 डिग्री की दूरी पर हो सकता है , जबकि शुक्र सूर्य से अधिकतम 47 डिग्री की दूरी पर होता है।

यही कारण है कि जन्‍मकुंडली में भी अधिकांश समय बुध और शुक्र सूर्य के साथ साथ ही होते हैं। किसी भी जन्‍मकुंडली में बुध सूर्य के साथ या उससे अगले खाने में हो सकता है , जबकि शुक्र सूर्य के साथ या उससे अधिकतम दो खाने आगे तक रह सकता है। इस प्रकार जिस महीने में सूर्य जिस राशि में होता है , बुध और शुक्र भी उसी राशि के आसपास होते हैं।

Sunday, 4 July 2010

हिंदी कैलेण्‍डर के माह के नाम नक्षत्रों के नाम पर होते हैं !!

आप सबों को यह मालूम होगा कि पृथ्‍वी की वार्षिक गति के हिसाब से अंग्रेजी कैलेण्‍डर में 365 दिनों का एक सौर वर्ष होता है । पुन: पृथ्‍वी अपनी कक्षा में घूमती हुई उसी स्‍थान पर आ जाती है , जहां से दूसरा वर्ष शुरू हो जाता है। इस 365 दिन को सामान्‍य ढंग से 12 भागों में बांटकर 12 महीने तैयार कर दिए गए हैं। पर हिंदी कैलेण्‍डर अंग्रेजी कैलेण्‍डर से पूर्णतया भिन्‍न है , हमारे परंपरागत कैलेण्‍डर में सौर वर्ष और चंद्रवर्ष दोनो की गणना अलग ढंग से की जाती है। सौरवर्ष की गणना उस दिन से आरंभ की जाती है ,जिस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। एक एक महीने में सूर्य की दूसरी राशि में संक्रांति के साथ साथ माह बदलता जाता है और 365 दिनों में एक वर्ष पूरा हो जाता है।

पर इसके अलावे पंचांग में एक और कैलेण्‍डर होता है , इसका आधार पृथ्‍वी की वार्षिक गति नहीं होती है। हिंदी कैलेण्‍डर में वर्ष की गणना न कर पहले महीने की गणना शुरू की जाती है। हिंदी के कैलेण्‍डर में पूर्णिमा के दूसरे दिन से लेकर अगले माह की पूर्णिमा तक एक माह पूरा होता है। इस प्रकार 12 माह होने पर एक वर्ष पूरा होता मान लिया जाता है। हिंदी महीनों के नाम हैं .. चैत्र , बैशाख , ज्‍येष्‍ठ , आषाढ , श्रावण , भाद्रपद , आश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ , फाल्‍गुन। एक पूर्णिमा से दूसरे पूर्णिमा तक का समय लगभग 29 दिन कुछ घंटों का होता है , इसी कारण हिंदी वर्ष 354 दिनों में ही समाप्‍त हो जाता है और नए वर्ष की शुरूआत हो जाती है। इसलिए तीन वर्ष बाद सौरवर्ष की तुलना में समय एक माह पीछे चलने लगता है। इसके समायोजन के लिए पंचांगों में हर तीसरे वर्ष एक अधिमास की व्‍यवस्‍था रखी गयी है।

वैसे तो सामान्‍य तौर पर 15 मार्च के आसपास से हिंदी वर्ष की शुरूआत होती है , जिस समय सूर्य मीन राशि में होता है , इसलिए चैत्र माह का अमावस्‍या मीन राशि में और पूर्णिमा कन्‍या राशि में होना चाहिए। इसी प्रकार बैशाख माह का अमावस्‍या मेष राशि में और पूर्णिमा तुला राशि में होना चाहिए , पुन: क्रम से ज्‍येष्‍ठ माह का अमावस्‍या वृष राशि में और पूर्णिमा वृश्चिक राशि में , आषाढ मास का अमावस्‍या मिथुन राशि में और पूर्णिमा धनु राशि में , श्रावण माह का अमावस्‍या कर्क राशि में और पूर्णिमा मकर राशि में , भाद्रपद का अमावस्‍या सिंह और पूर्णिमा कुंभ राशि में , आश्विन का अमावस्‍या कन्‍या और पूर्णिमा मीन राशि में , कार्तिक का अमावस्‍या तुला और पूर्णिमा मेष राशि में , मार्गशीर्ष का अमावस्‍या वृश्चिक और पूर्णिमा वृष राशि में , पौष का अमावस्‍या धनु और पूर्णिमा मिथुन राशि में , माघ का अमावस्‍या मकर और पूर्णिमा कर्क राशि में तथा फाल्‍गुन का अमावस्‍या कुंभ और पूर्णिमा सिंह राशि में होना चाहिए।

पर सौरवर्ष की तुलना में चंद्रवर्ष के पीछे खिसकते जाने से हिंदी कैलेण्‍डर का माह इस तरह निश्चित नहीं रह पाता है। दरअसल हिंदी माह की गणना नक्षत्रों के हिसाब से की जाती है , जिस महीने पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में पडे , वहां चैत्र का महीना , जिस महीने पूर्णिमा बिशाखा नक्षत्र में पडे , बैशाख का महीना , जिस महीने पूर्णिमा ज्‍येष्‍ठा नक्षत्र में पडे , ज्‍येष्‍ठ महीना , जिस महीने पूर्णिमा पूर्वाषाढा नक्षत्र में पडे , आषाढ का महीना , जिस महीने पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र में पडे , श्रावण का महीना , जिस महीने पूर्वभा्रद्रपद नक्षत्र में पडे , भाद्रपद का महीना , जिस महीने पूर्णिमा अश्विनी नक्षत्र में पडे , उस महीने आश्विन का महीना , जिस महीने पूर्णिमा कृतिका नक्षत्र में पडे , कार्तिक का महीना , जिस महीने पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र में पडे , माघ का महीना , जिस महीने पूर्णिमा पुष्‍य नक्षत्र में पडे , पोष का महीना तथा जिस महीने पूर्णिमा फाल्‍गुनी नक्षत्र में पडे , उसे फाल्‍गुन का महीना माना जाता है।

Monday, 28 June 2010

क्‍या नक्षत्र तारों का समूह होता है ??

सामान्‍य लोग 'नक्षत्र ' शब्‍द को तारे या तारे के समूह के लिए ही प्रयोग करते हैं , पर ज्‍योतिष में 'नक्षत्र' का यह अर्थ नहीं है। आसमान में 30 डिग्री का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले राशि की तरह नक्षत्र भी पूरे गोलाकार आसमान के 360 डिग्री को 27 भागों में बांटने से बने 13 डिग्री 20 मिनट की कोणिक दूरी का प्रतिनिधित्‍व करता है। जिस प्रकार एक राशि को पहचानने और उसे याद रखने के लिए उसमें स्थित तारा समूहों को लेकर एक खास आकार दिया गया है , उसी प्रकार नक्षत्रों को पहचानने के लिए भी उसमें स्थित तारा समूहों को याद रखा जाता है , पर नक्षत्र ताराओं का समूह नहीं होता , जैसा कि लोगों के मन में भ्रम है।

आसमान के 12 भागों में बंटवारा कर देने के बाद भी ऋषि मुनियों ने इसके और सूक्ष्‍म अध्‍ययन के लिए इसे 27 भागों में बांटा , जिससे 13 डिग्री 20 मिनट का एक एक नक्षत्र निकला। आकाश में चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा पर चलता हुआ 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है, इस तरह चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र को पार करता है। किसी व्‍यक्ति‍ का जन्‍म नक्षत्र वही होता है , जहां उसके जन्‍म के समय चंद्रमा होता है। ऋषि मुनि ने व्‍यक्ति के जन्‍म के नक्षत्र को बहुत महत्‍व दिया था , और इसके अध्‍ययन के लिए हर नक्षत्र के प्रत्‍येक चरण के लिए अलग अलग 'अक्षर' रखे थे। बच्‍चे के नाम में पहला अक्षर नक्षत्र का ही हुआ करता था, जिससे एक नक्षत्र के बच्‍चे को बडे होने के बाद भी अलग किया जा सकता था।  शायद बडे स्‍तर पर रिसर्च के लिए ऋषि मुनियों ने यह परंपरा शुरू की हो।

0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है ..  अश्विनी , भरणी , कृत्तिका , रोहिणी , मॄगशिरा , आद्रा , पुनर्वसु , पुष्य  , अश्लेशा , मघा , पूर्वाफाल्गुनी , उत्तराफाल्गुनी , हस्त  , चित्रा , स्वाती , विशाखा , अनुराधा , ज्येष्ठा , मूल , पूर्वाषाढा , उत्तराषाढा ,  श्रवण , धनिष्ठा , शतभिषा , पूर्वाभाद्रपद , उत्तराभाद्रपद , रेवती । अधिक सूक्ष्‍म अध्‍ययन के लिए एक एक नक्षत्र को पुन: चार चार चरणों में बांटा गया है। चूंकि राशि बारह हैं , और नक्षत्र 27 , और सबके चार चार चरण। इसलिए एक राशि के अंतर्गत किन्‍ही तीन नक्षत्र के 9 चरण आ जाते हैं । विवाह के समय जन्‍म कुंडली मिलान के लिए वर और वधू के जन्‍म नक्षत्र का ही सबसे अधिक महत्‍व होता है।

आसमान में सूर्य जब इन नक्षत्रों को पार करता रहता है , तो मौसम के लिए इन नक्षत्रों का प्रयोग किया जाता है। चूंकि सूर्य की गति एक डिग्री प्रतिदिन की है , इसलिए एक एक नक्षत्र को पार करने में इसे लगभग 13 दिन ही लगते हैं। लगभग का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी के अंडाकार पथ होने से सारे नक्षत्रों को पार करने में अलग अलग समय लगता है। हर नक्षत्रों से होते हुए सूर्य 22 जून से आर्द्रा में चल रहा है , जो 6 जुलाई से पुनवर्सु में , 20 जुलाई से पुष्‍य में , 3 अगस्‍त से अश्‍लेषा में चलने के बाद 17 अगस्‍त को मघा में प्रवेश के बाद 30 अगस्‍त को पूर्वा फाल्‍गुनी नक्षत्र में प्रवेश करेगा। मौसम की चर्चा में भी आपने इन नक्षत्रों का नाम अवश्‍य सुना होगा।

.

Sunday, 27 June 2010

हर माह अमावस्‍या और पूर्णिमा अलग अलग राशियों में होती है !!

कल के आलेख में हमने जाना कि जितने दिनों तक सूर्य एक राशि में होता है , उतने दिनों में चंद्रमा पूरे आकाश का चक्‍कर लगा लेता है और इस तरह जन्‍मकुंडली में सूर्य के सापेक्ष चंद्रमा की स्थिति को देखते हुए हिंदी माह की तिथियों का आकलन किया जा सकता है। सभी राशियों में घूमते हुए एक माह बाद जबतक चंद्रमा सूर्य के नजदीक पहुंचने को होता है , तो सूर्य एक राशि आगे बढ चुका होता है। इस तरह अगले माह की अमावस्‍या पिछले माह में होनेवाली राशि से एक राशि बाद ही हो पाती है। सूर्य के एक राशि आगे बढ जाने से उसके सामने चंद्रमा को जाने में भी एक राशि आगे बढना पडता है और इस तरह अगले माह की पूर्णिमा भी एक राशि बाद ही होती है।

अब चूंकि 15 अप्रैल से 15 मई तक सूर्य मेष राशि में होता है , उस मध्‍य जब चंद्रमा मेष राशि में पहुंचेगा , तो अमावस्‍या होगी , इस कारण अमावस्‍या मेष राशि में ही होगी। उससे छह राशि आगे जाकर ही चंद्रमा सूर्य के सामने हो सकेगा , इस कारण इस माह में पूर्णिमा तुला राशि में होगी। इसी प्रकार 15 मई से 15 जून के मध्‍य सूर्य के वृष राशि में होने से उस मध्‍य अमावस्‍या वृष राशि में और पूर्णिमा वृश्चिक राशि में होती है। इसी नियम से 15 जून से 15 जुलाई के मध्‍य अमावस्‍या मिथुन राशि में तथा पूर्णिमा धनु राशि में , 15 जुलाई से 15 अगस्‍त के मध्‍य अमावस्‍या कर्क राशि में और पूर्णिमा मकर राशि में, 15 अगस्‍त से 15 सितंबर के मध्‍य अमावस्‍या सिंह राशि में और पूर्णिमा कुंभ राशि में , 15 सितंबर से 15 अक्‍तूबर के मध्‍य अमावस्‍या कन्‍या राशि में और पूर्णिमा मीन राशि में होती है।

यही क्रम आगे बढता जाता है और 15 अक्‍तूबर से 15 नवंबर के मध्‍य अमावस्‍या तुला राशि में और पूर्णिमा मेष राशि में , 15 नवंबर से 15 दिसंबर के मध्‍य अमावस्‍या वृश्चिक राशि में और पूर्णिमा वृष राशि में , 15 दिसंबर से 15 जनवरी के मध्‍य अमावस्‍या धनु राशि में और पूर्णिमा मिथुन राशि में , 15 जनवरी से 15 फरवरी के मध्‍य अमावस्‍या मकर राशि में और पूर्णिमा कर्क राशि में , 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्‍य अमावस्‍या कुंभ राशि में और पूर्णिमा सिंह राशि में तथा 15 मार्च से 15 अप्रैल के मध्‍य अमावस्‍या मीन राशि में और पूर्णिमा कन्‍या राशि में हुआ करता है। इस तरह हर माह अमावस्‍या तथा पूर्णिमा अलग अलग राशियों में हुआ करता है ।

Friday, 25 June 2010

जन्‍मकुंडली से तिथि का अनुमान किया जा सकता है !!

ज्‍योतिष जैसे गूढ विषय को सैद्धांतिक रूप में नहीं , यानि किताबी भाषा में नहीं , व्‍यावहारिक तौर पर लेख के द्वारा समझाने का प्रयास करना आसान नहीं, भाषा के हेरफेर से कुछ त्रुटि रह ही जाती है , पिछले पोस्‍ट पर हुई ऐसी ही गलती पर हमारा ध्‍यान दिनेश राय द्विवेदी जी ने आकृष्‍ट किया। निंदक के तौर पर उनकी टिप्‍पणियों के मिलने से आप सबों की जानकारी में अवश्‍य वृद्धि होगी। वैसे उनके द्वारा टिप्‍पणी की गयी भाषा में थोडी तल्‍खी अवश्‍य है, जो किसी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होने पर स्‍वाभाविक रूप से आ जाती है, इसलिए इसे इग्‍नोर करना ही मैं उचित समझती हूं।

दरअसल अपने ब्‍लॉग के सामान्‍य पाठकों को अभी पंचांग के बारे में जानकारी देने का मेरा इरादा नहीं था , अभी तक लिखे गए आलेखों में जन्‍मकुंडली को देखकर आसमान की स्थिति , लग्‍न , जन्‍म समय , सूर्यराशि और चंद्रराशि निकालने के बारे में जानकारी देने के बाद इस आलेख के द्वारा मैं तो मात्र यह समझाना चाह रही थी कि किसी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखते हुए आप जन्‍म के महीने का मोटामोटी अंदाजा किस प्रकार लगा सकते हैं , जिस दिन आपलोगों को पंचांग के बारे में जानकारी मिलेगी , बहुत कुछ समझ में आ ही जाएगा।

जैसा कि अबतक हम समझ चुके , सूर्य एक एक महीने प्रत्‍येक राशि में होता है , उस एक महीने के दौरान चंद्रमा सभी राशियों का चक्‍कर लगा लेता है। चंद्रमा को 360 डिग्री की इन बारहों राशियों को पार करने में लगभग 30 दिन लगते हैं , क्‍यूंकि वह ढाई ढाई दिनों तक एक राशि में रहता है। जब जन्‍मकुंडली में सूर्य और चंद्र एक साथ हो , तो वह अमावस्‍या या उसके आसपास का दिन होता है , जबकि जन्‍मकुंडली में सूर्य और चंद्र आमने सामने हो , तो वह पूर्णिमा या उसके आस पास का दिन होता है।

जन्‍मकुंडली में सूर्य से दूर होते हुए चंद्रमा को देखकर आप शुक्‍ल पक्ष की विभिन्‍न तिथियों का अंदाजा लगा सकते हैं। सूर्य से एक खाने बाद रहने वाले चंद्र से तृतीया के आसपास , सूर्य से दो खाने बाद रहने वाले चंद्र से पंचमी के आसपास , सूर्य से तीन खाने बाद रहने वाले चंद्र से अष्‍टमी के असपास , सूर्य से चार खाने बाद रहने वाले चंद्र से दशमी के आसपास , सूर्य से पांच खाने बाद रहने वाले चंद्र से त्रयोदशी के आसपास और सूर्य के सामने रहने वाले चंद्रमा से पूर्णिमा के आसपास की तिथि में बालक का जन्‍म समझा जा सकता है।

इस तरह जन्‍मकुंडली में सूर्य की ओर प्रवृत्‍त होते चंद्रमा को देखकर आप कृष्‍ण पक्ष की विभिन्‍न तिथियों का आकलन कर सकते हैं । सूर्य से पांच खाने पहले रहनेवाले चंद्र से तृतीया के आसपास , सूर्य से चार खाने पहले रहने वाले चंद्र से पंचमी के आसपास , सूर्य से तीन खाने पहले रहने वाले चंद्र से अष्‍टमी के आसपास , सूर्य से दो खाने पहले रहने वाले चंद्र से दशमी के आसपास , सूर्य से एक खाने पहले रहनेवाले चंद्र से त्रयोदशी के आसपास और सूर्य के साथ रहने वाले चंद्र से अमावस्‍या के आसपास की तिथि में बालक का जन्‍म समझा जा सकता है।

Thursday, 24 June 2010

पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषियों के अनुसार सूर्य राशि

पिछले आलेख में लिखी गयी खा‍मी की ओर डॉ महेश सिन्‍हा जी और हेम पांडेय जी ने इशारा किया। वास्‍तव में एक एक तिथि की चर्चा न कर पिछले आलेख में पूरे वर्ष के दौरान मैं मोटे तौर पर सूर्य के प्रत्‍येक राशि में एक एक महीने समझाना था , क्‍यूंकि इन एक दो दिनों के विचलन पर ध्‍यान देने में पाठकों को संकेन्‍द्रण गडबड हो सकता था।

वास्‍तव में सूर्य 15 अप्रैल को मेष राशि में जाकर 14 मई तक वहां रहकर 15 मई से 15 जून तक वृष राशि में होता है। इसी प्रकार 16 जून से 15 जुलाई तक मिथुन में, 16 जुलाई से 16 अगस्‍त तक कर्क में, 17 अगस्‍त से 17 सितंबर सिंह में, 18 सितंबर से 17 अक्‍तूबर कन्‍या में, 18 अक्‍तूबर से 16 नवंबर तुला में, 17 नवंबर से 16 दिसंबर वृश्चिक में, 17 दिसंबर से 14 जनवरी धनु में, 15 जनवरी से 12 फरवरी मकर में, 13 फरवरी से 14 मार्च कुंभ में तथा 15 मार्च से 14 अप्रैल तक मीन राशि में घूमते हुए पुन: 15 अप्रैल को मेष राशि में प्रवेश करता है। इसी के आधार पर सूर्यराशि का फैसला किया जा सकता है।
कुछ मासिक पत्रिकाओं में हर महीने की 22 या 23 तारीख को ही सूर्य का राशि परिवर्तन दिखाया जाता है , Aries (21 March-20 April)
Taurus (21 April-21 May)
Gemini (22 May-21 June)
Cancer (22 June-22 July)
Leo (23 July-22 August)
Virgo (23 August-21 September)
Libra (22 September-22 October)
Scorpio (23 October-21 November)
Sagittarius (22 November-21 December)
Capricorn (22 December-20 January)
Aquarius (21 January-19 February)
Pisces (20 February-20 March)
यानि हमारे द्वारा गणना किए जानेवाली तिथि से 24 या 25 दिन पूर्व ही , इसका कारण पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषियों द्वारा आसमान के 0 डिग्री को भारतीय ज्‍योतिषियों से 25 डिग्री पहले मान लिया जाना है। इसके कारण की चर्चा कभी बाद में , पर हमारा मत है कि हमारे ऋषियों द्वारा तय किए गए राशि वर्गीकरण में कोई खामी नहीं है और इसमें किसी प्रकार के तर्क को घुसेडने की कोई जगह नहीं।

Monday, 21 June 2010

किसी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर जन्‍म के महीने का पता लगाया जा सकता है !!

पिछले आलेख में हमने जाना कि पृथ्‍वी की घूर्णन गति के फलस्‍वरूप सूर्य 24 घंटों में एक बार आसमान के चारो ओर घूमता नजर आता है। इस कारण सूर्य की स्थिति को देखते हुए किसी भी लग्‍नकुंडली के द्वारा बच्‍चे के जन्‍म का समय निकाला जा सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं , पृथ्‍वी की परिभ्रमण गति के कारण भी सूर्य की स्थिति में परिवर्तन देखा जाता है । आसमान को 12 भागों में बांटते वक्‍त जहां पर 0 डिग्री से शुरू किया गया है , उस स्‍थान पर सूर्य प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को पहुंच जाता है और प्रतिदिन एक एक डिग्री बढता हुआ वर्षभर बाद पुन: उसी स्‍थान पर पहुंच जाता है। इस प्रकार यह एक एक महीने में 12 राशियों को पार करता जाता है।

सूर्य की स्थिति 14 अप्रैल से 14 मई तक मेष राशि में , 14 मई से 14 जून तक वृष राशि में , 14 जून से 14 जुलाई तक मिथुन राशि में 14 जुलाई से 14 अगस्‍त तक कर्क राशि में , 14 अगस्‍त से 14 सितंबर तक सिंह राशि में , 14 सितंबर से 14 अक्‍तूबर तक कन्‍या राशि में , 14 अक्‍तूबर से 14 नवंबर तक तुला राशि में , 14 नवंबर से 14 दिसंबर तक वृश्चिक राशि में , 14 दिसंबर से 14 जनवरी तक धनु राशि में , 14 जनवरी से 14 फरवरी तक मकर राशि में , 14 फरवरी से 14 मार्च तक कुंभ राशि में तथा 14 मार्च से 14 अप्रैल तक मीन राशि में होती है। 

यही कारण है कि 14 अप्रैल से 14 मई तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मेष , 14 मई से 14 जून तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि वृष , 14 जून से 14 जुलाई तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मिथुन , 14 जुलाई से 14 अगस्‍त तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि कर्क  , 14 अगस्‍त से 14 सितंबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि सिंह , 14 सितंबर से 14 अक्‍तूबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि कन्‍या , 14 अक्‍तूबर से 14 नवंबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि तुला  , 14 नवंबर से 14 दिसंबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि वृश्चिक , 14 दिसंबर से 14 जनवरी तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि धनु , 14 जनवरी से 14 फरवरी तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मकर , 14 फरवरी से 14 मार्च तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि कुंभ तथा 14 मार्च से 14 अप्रैल तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मीन होती है।

इसलिए किसी भी जन्‍मकुंडली में बालक की सूर्यराशि मेष हो तो समझ लें कि जातक ने14 अप्रैल से 14 मई के मध्‍य जन्‍म लिया है। इसी प्रकार सूर्यराशि वृष हो , तो उसके 14 मई से 14 जून के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि मिथुन हो , तो उसके 14 जून से 14 जुलाई के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि कर्क हो , तो उसके 14 जुलाई से 14 अगस्‍त के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्य राशि सिंह हो तो उसके 14 अगस्‍त से 14 सितंबर तक जन्‍म लेने , सूर्य राशि कन्‍या हो , तो उसके 14 सितंबर से 14 अक्‍तूबर के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्य राशि तुला हो , तो उसके 14 अक्‍तूबर से 14 नवंबर के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्य राशि वृश्चिक हो , तो उसके 14 नवंबर से 14 दिसंबर के मध्‍य जन्‍मलेने , सूर्य राशि धनु हो तो उसके 14 दिसंबर से 14 जनवरी के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि मकर हो , तो उसके 14 जनवरी से 14 फरवरी के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि कुंभ हो , तो उसके 14 फरवरी से 14 मार्च के मध्‍य जन्‍म लेने तथा सूर्यराशि मीन हो , तो उसके 14 मार्च से 14 अप्रैल के मध्‍य जन्‍म लेने की पुष्टि हो जाती है।


Friday, 18 June 2010

सिर्फ लग्‍नकुंडली से ही जातक के लग्‍न का प्रहर जाना जा सकता है !!

पिछले आलेख में चर्चा हुई थी कि किसी भी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर बालक के जन्‍म के पहर की जानकारी कैसे प्राप्‍त की जा सकती है। इसपर एक टिप्‍पणी मिली है कि इस विधि से हम सिर्फ लग्‍न कुंडली से ही जन्‍म के समय की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं , चंद्रकुंडली और सूर्य कुंडली के आधार पर समय की जानकारी नहीं प्राप्‍त कर सकते, बिल्‍कुल सही टिप्‍पणी है। दरअसल ज्‍योतिष में जब भी सिर्फ कुंडली की चर्चा की जाती है , तो वह जन्‍मकुंडली यानि लग्‍न कुंडली ही होती है। भविष्‍यवाणियों में सटीकता लाने के लिए चंद्रकुंडली , सर्यूकुंडली या अन्‍य अनेक प्रकार की कुंडली बनाए जाने की परंपरा शुरू हुई है। लेकिन गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की माने तो आज भी लग्‍नकुंडली ही किसी व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व का दर्पण है , जो उसके पूरे जीवन के विभिन्‍न संदर्भो के सुख दुख और जीवन भर की परिस्थितियों के उतार और चढाव की जानकारी दे सकता है, जिसपर चर्चा करने में अभी कुछ समय तो अवश्‍य लगेगा। भविष्‍यवाणी करने के लिए चंद्र कुंडली , सूर्यकुंडली या सूक्ष्‍मतर रूप से बनाए जाने वाले अन्‍य कुंडलियों का भी आंशिक प्रभाव माना ही जा सकता है।
वैसे चाहे लग्‍नकुंडली हो, चंद्र कुंडली हो, सूर्य कुंडली हो या अन्‍य कोई भी कुंडली , बालक के जन्‍म के समय आसमान में ग्रहों की जो स्थिति होती है , उसी को दर्शाया जाता है , सिफर् अलग अलग खाने को महत्‍व देने से ये कुंडलियां परिवर्तित हो जाती हैं। जिस खाने को महत्‍व दिया जाए , उसे सबसे ऊपर यानि मस्‍तक पर रख दिया जाता है। जब हम लग्‍न को महत्‍व देते हैं , लग्‍नवाले खाने को ऊपर रखते हैं , इससे लग्‍नकुंडली बन जाती है। जब हम चंद्र को महत्‍व देते हैं , चंद्र वाले खाने को ऊपर रखते हैं , चंद्रकुंडली बन जाती है। जब हम सूर्य को महत्‍व देते हैं , सूर्य वाले खाने को ऊपर रखते हैं , सूर्यकुंडली बन जाती है। इसी प्रकार अन्‍य ग्रहों को भी महत्‍व देते हुए आप अन्‍य प्रकार की कुंडली बना सकते हैं , पर उसमें अन्‍य ग्रहों की स्थिति में हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। नीचे एक जातक की तीनो कुंडलियां देखिए , प्रत्‍येक कुंडली में ग्रहों की स्थिति समान जगह पर है , सिर्फ उन्‍हें अपने तरीके से घुमा दिया गया है। ये है लग्‍नकुंडली ....

                                   
ये है चंद्रकुंडली ........

और ये है सूर्यकुंडली ....

                                      
जैसा कि पहले भी लिखा जा चुका है , सूर्य कुंडली या चंद्र कुंडली तो ढाई दिनों तक पूरे 24 घंटों तक जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के लिए एक ही बनेगी , सिर्फ लग्‍न कुंडली ही मात्र दो घंटे तक यानि पूर्वी क्षितिज में एक लग्‍न के उदय होने तक एक सी रहती है , इसलिए यही बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज की जानकारी दे पाती है , यही कारण है कि इसी कुंडली से बालक के जन्‍म के समय को जाना जा सकता है। 

Thursday, 17 June 2010

जन्‍मकुंडली से जन्‍म के प्रहर का अनुमान किया जा सकता है !!

ज्‍योतिष आम लोगों के लिए बिल्‍कुल नया विषय है और हममें से सभी लोगों के दिमाग में यह बात पहले से है कि यह बहुत ही जटिल विषय है , इसलिए ज्‍योतिष सीखा ही नहीं जा सकता। लेकिन बात ऐसी नहीं है , ज्‍योतिष के सारे नियम जटिल क्‍यूं कर होंगे , अब हमें जिस विषय का विशेषज्ञ बनना होता है , उसी में विशिष्‍टता हासिल करते हैं , पर बाकी विषयों की भी सामान्‍य जानकारी तो रखते ही हैं। ज्‍योतिष में भी सामान्‍य जानकारी रखना बहुत कठिन नहीं है , सिर्फ अपनी जिज्ञासाओं को हमारे सामने अवश्‍य रखें और इस ज्ञान को प्राप्‍त करने में आगे बढते जाएं। जैसा कि मैं पुराने लेखों में भी लिख चुकी हूं कि पृथ्‍वी की पश्चिम से पूर्व की ओर अपने अक्ष पर घूमने के कारण ही आसमान की एक चौडी पट्टी पूरब से पश्चिम की ओर जाती दिखती है और उसी पट्टी के 360 डिग्री के 12 भाग कर 12 राशियां निकाले गए हैं । इसी चौडी पट्टी में सभी ग्रह कभी थोडा उत्‍तर और कभी थोडा दक्षिण होते हुए उदित होते हैं और आगे बढते हुए अस्‍त भी हो जाते हैं। बालक के जन्‍म के समय इसी पट्टी में स्थित ग्रहों को उसी अनुसार रखते हुए उसकी जन्‍मकुंडली बनायी जाती है , जिसके बारे में मैने पुराने लेख में लिखा था।

एक सूर्य को ही लें , पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण सूर्य 24 घंटे में पृथ्‍वी का पूरा चक्‍कर लगाता दिखता है। जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखते हुए आप आकलन कर सकते हैं कि उक्‍त बच्‍चे का जन्‍म किस वक्‍त हुआ है । पिछले दिन दिए गए चार्ट में सूर्य लग्‍नराशि वाले खाने में था , जो पूरब की दिशा का द्योतक होता है। इसका अर्थ यह है कि बालक के जन्‍म के समय सूर्य पूरब दिशा में था , पूरब दिशा में सूर्य सवेरे होता है , इसलिए बालक का जन्‍म सवरे यानि सूर्योदय के आसपास हुआ है। अब कुंडली में यहां से सूर्य जैसे जैसे एक एक खाने सरकता जाएगा , जातक का जन्‍म समय में सूर्योदय से दो दो घंटे का अंतर होता जाएगा । मध्‍य आकाश वाली राशि पर सूर्य के होने का अर्थ है कि जातक का जन्‍म दोपहर के आसपास हुआ है। पुन: कुंडली में उससे आगे एक एक राशि में सूर्य के बढने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म दोपहर के दो घंटे बाद या चार घंटे बाद हुआ है। इसी प्रकार पश्चिमी क्षितिज की राशि में सूर्य के होने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म सूर्यास्‍त का है , जबकि विपरीत दिशा के आकाश की ओर सूर्य के होने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म मध्‍य रात्रि का है।

इस चित्र के माध्‍यम से अच्‍छी तरह समझाया गया है कि जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर आकलन किया जा सके कि उसका जन्‍म किस वक्‍त हुआ था।  ज्‍योतिषी भले ही पंचांगों को देखकर जन्‍मकुंडली बना लेते हो , यह सामान्‍य जानकारी उनमें से भी बहुतों को नहीं मालूम होती है। आनेवाले समय में किसी कुंडली के चक्र को देखकर ही आप बता सकते हैं कि जिसकी कुंडली है , उसका जन्‍म किस बेला में हुआ था। है न आम व्‍यक्ति के लिए बहुत रोचक जानकारी ??

Wednesday, 16 June 2010

जन्‍मकुंडली बच्‍चे के जन्‍म के समय का पूरे आसमान का चित्र है !!

कल के आलेख से हमें जानकारी मिली कि आसमान के गोलाकार 360 डिग्री के 12 भाग कर 12 राशियां बना दी गयी है। अभी तक तो आपको इनके नाम भी याद हो गए होंगे। जन्‍मकुंडली में जिस खाने में 1 लिखा होता है , वह मेष राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है , जहां 2 लिखा होता है , वह वृष राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है , इसी प्रकार जिस खाने में 3 लिखा हो , वह मिथुन , जिस खाने में 4 लिखा हो , वह कर्क , जिस खाने में 5 लिखा हो , वो सिंह , जिस खाने में 6 लिखा हो , वो कन्‍या , जिस खाने में 7 लिखा हो , वह तुला , जिस खाने में 8 लिखा हो , वह वृश्चिक ,जहां 9 लिखा हो , वह धनु , जहां 10 लिखा हो , वह मकर , जहां 11 लिखा हो , वह कुंभ तथा जहां 12 लिखा हो , वह खाना मीन राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रह इन्‍हीं 12 राशियों में घडी के कांटो की दिश्‍श में घूमते हुए दिखाई देते हैं ।

चूंकि किसी व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली उसके जन्‍म के समय आसमान के बारहो राशियों और सभी ग्रहों की स्थिति को दिखलाती है , इसलिए उसमें बारहो राशियों और सारे ग्रहों का उल्‍लेख होगा ही। जन्‍मकुंडली में सभी ग्रहों को एक एक अक्षर में लिखा जाता है। सूर्य के लिए सू , चंद्रमा के लिए चं , बुध के लिए बु , मंगल के लिए मं , शुक्र के लिए शु , बृहस्‍पति के लिए बृ , शनि के लिए श , राहू के लिए रा और केतु के लिए के का प्रयोग किया जाता है। इसलिए जन्‍मकुंडली में बारह खाने के रूप में सभी राशियां तथा किसी न किसी राशि में संक्षिप्‍त रूप में नवों ग्रह दिखाई देंगे। जन्‍मकुंडली में  जिस राशि में सूर्य हो , वह व्‍यक्ति की सूर्य राशि तथा जिस राशि में चंद्र हो , वह व्‍यक्ति की चंद्र राशि होगी । किसी व्‍यक्ति के लग्‍नराशि को जानने के लिए कुंडली चक्र को सीधा रखकर उसके सबसे ऊपर मध्‍य खाने में लिखे अंक को देखना चाहिए।

संलग्‍न चित्र से यह स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि किसी की जन्‍मकुंडली में स्थित मध्‍य विंदू हमारी पृथ्‍वी होती है , सबसे ऊपर में मध्‍य का खाना बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज को दर्शाता है , इसलिए उसमें लिखे अंक वाली राशि ही बालक की लग्‍नराशि होती है। इसके अलावे सबसे नीचे का खाना बालक के जन्‍म के समय पश्चिमी क्षितिज को दर्शाता है । दायीं ओर का खाना जातक की ओर के मध्‍य आकाश तथा तथा बायीं ओर का खाना पृथ्‍वी के उल्‍टी ओर के मध्‍य आकाश को दर्शाता है। इसलिए जन्‍मकुंडली में सबसे ऊपर के मध्‍य वाले खाने में कोई ग्रह दिखाई दें , तो समझना चाहिए कि उस ग्रह का उदय भी बच्‍चे के जन्‍म के साथ ही हो रहा था। इसी प्रकार सबसे नीचे के खाने में कोई ग्रह हो , तो समझना चाहिए कि वह ग्रह बच्‍चे के जन्‍म के समय पश्चिमी क्षितिज पर चमकते हुए अस्‍त होने को था। इसी प्रकार अन्‍य खानों और उनमें स्थित राशियों का भी अर्थ लगाया जा सकता है।



अभी तक की ज्‍योतिषीय जानकारी के बाद पाठकों से यह अपेक्षा रखूंगी कि वो बताएं कि ऊपर दिए गए जन्‍मकुंडली के अनुसार जातक की लग्‍न राशि , सूर्य राशि या चंद्र राशि क्‍या होगी , उसके जन्‍म के समय कौन से ग्रह उदय हो रहे थे , कौन से अस्‍त हो रहे थे और कौन से ग्रह मध्‍य आकाश में चमक रहे थे।                     

Sunday, 13 June 2010

भचक्र की राशियों में से तीन हमारे लिए बहुत महत्‍वपूर्ण

आज एक बार फिर से शीर्षक में परिवर्तन करते हुए पिछली कडी को आगे बढा रही हूं। हमारा सामना अक्‍सर कुछ वैसे लोगों से होता है , जो ऐसे तो कभी ग्रहों या ज्‍योतिष पर विश्‍वास नहीं करते , पर जब कभी लंबे समय तक चलने वाली किसी विपत्ति में फंसते हैं , ज्‍योतिष पर अंधविश्‍वास ही करने लगते हैं। ऐसी हालत में उनकी परेशानियां दुगुनी तिगुणी बढने लगती है ,अपनी समस्‍याओं में त्‍वरित सुधार लाने के लिए वे उस समय हम जैसों की अच्‍छी सलाह भी नहीं मानते। ज्ञान हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन करती है , ज्‍योतिष को जानने के बाद आप स्‍वयं सही निर्णय ले सकते हैं। यही सोंचकर मै अधिक से अधिक लोगों को खेल खेल में ज्‍योतिष सीखलाने की बात सोंच रही हूं , आप सबों का सहयोग मुझे अवश्‍य सफलता देगा।


पिछले लेखमाला में हमने सीखा कि ज्‍योतिष में पृथ्‍वी के सापेक्ष पूरे भचक्र का अवलोकण किया जाता है , साथ ही सूर्य के उदाहरण से समझने में सफलता मिली कि विभिन्‍न पिंड पृथ्‍वी सापेक्ष अपनी स्थिति के अनुरूप ही पृथ्‍वी पर प्रभाव डालते हैं। पहले ही लेख में चर्चा की गयी है कि पृथ्‍वी को स्थिर मानकर पूरे आसमान के 360 डिग्री को 12 भागों में बांटने से 30 - 30 डिग्री की 12 राशियां बनती है। आमान के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक को मेष , 30 डिग्री से 60 डिग्री तक को वृष , 60 डिग्री से 90 डिग्री तक को मिथुन , 90 डिग्री से 120 डिग्री तक को कर्क , 120 डिग्री से 150 डिग्री तक को सिंह , 150 से 180 डिग्री तक को कन्‍या , 180 से 210 डिग्री तक को तुला , 210 से 240 डिग्री तक को वृश्चिक , 240 से 270 डिग्री तक को धनु , 270 डिग्री से 300 डिग्री तक को मकर , 300 से 330 डिग्री तक को कुंभ तथा 330 से 360 डिग्री तक को मीन कहा जाता है।
 
हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के 0 डिग्री एक आधार को लेकर निश्चित किया गया था , पर कुछ ज्‍योतिष विरोधी हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के अध्‍ययन के लिए किए गए इस विभाजन को भी अवास्‍तविक मानते हैं , पर मेरे अनुसार यह विभाजन ठीक उसी प्रकार किया गया है , जिस प्रकार पृथ्‍वी के अध्‍ययन के लिए हमने आक्षांस और देशांतर रेखाएं खींची हैं। जिस प्रकार भूमध्‍य रेखा से ही 0 डिग्री की गणना की जानी सटीक है तथा देशांतर रेखाओं  की शुरूआत और अंत दोनो ध्रुवों पर करना आवश्‍यक है , उसी प्रकार आसमान में किसी खास विंदू से 0 डिग्री शुरू कर चारो ओर घुमाते हुए 360 डिग्री तक पहुंचाया गया है , हालांकि यह विंदू भी ज्‍योतिष में विवादास्‍पद बना हुआ है , जिसका कोई औचित्‍य नहीं। पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण 24 घंटों में ये बारहों राशियां पूरब से उदित होती हुई पश्चिम में अस्‍त होती जाती है।
 
यूं तो ये बारहों राशियां और इनमें स्थित ग्रह हमारे लिए महत्‍वपूर्ण हैं , पर तीन राशियां सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण होती हैं। पहली, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय सूर्य होता है , वो उसकी सूर्य राशि कहलाती है। दूसरी, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय चंद्रमा होता है , वो उसकी चंद्र राशि कहलाती है। तीसरी, जिस राशि का उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता है, वह बालक की लग्‍न राशि कलाती है। एक महीने तक सूर्य एक ही राशि में होता है , इसलिए एक महीने के अंदर जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक सूर्य राशि में आ जाते हैं। ढाई दिनों तक चंद्रमा एक ही राशि में होता है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक ही चंद्र राशि में आते हैं। दो घंटे तक एक ही लग्‍न उदित होती रहती है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी बच्‍चे एक ही लग्‍न राशि में आ जाते हैं।

Saturday, 12 June 2010

अचल होते हुए भी पृथ्‍वी की गति के सापेक्ष सूर्य का प्रभाव पडता है !!

कल के ही लेख को आगे बढाने का प्रयास कर रही हूं , पर एक टिप्‍प्‍णी के कारण शीर्षक में से वैज्ञानिक दृष्टिकोण हटा दिया जा रहा है। जब भी मैं ज्‍योतिष को विज्ञान कहती हूं , उनलोगों को कष्‍ट पहुंचता है , जो मोटे मोटे किताबों में लिखे वैज्ञानिकों खासकर विदेशियों के सिद्धांतों को ही विज्ञान मानते हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा परंपरागत अनुभव के आधार पर विकसित किए गए नियमों और खासकर हमारे ऋषि मुनियों के ज्ञान का इनके लिए कोई महत्‍व नहीं। और किसी को कष्‍ट पहुंचे , ऐसा कोई काम मैं नहीं करना चाहती , यदि ज्‍योतिष विज्ञान है , तो आनेवाले दिनों में मेरे पाठकों के समक्ष स्‍वत: सिद्ध हो जाएगा, चाहे इसकी चर्चा शीर्षक में करूं या नहीं , इतना तो मुझे विश्‍वास है।

कल के लेख में मैने समझाया था कि सबों की नजर अपने को स्थिर मानकर ही परिस्थितियों का अवलोकन करती है। इसलिए हमलोग असमान का अवलोकण पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए करते हैं , इसलिए ज्‍योतिष के इस महत्‍वपूर्ण आधार को गलत साबित करना सही नहीं है। बात अवलोकन तक तो ठीक मानी जा सकती है , पर हमारे अवलोकण से उन राशियों या ग्रहों नक्षत्रों का पृथ्‍वी के जड चेतन पर प्रभाव भी पड जाए , यह तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण वालों को तर्कसम्‍मत नहीं लगता। और ज्‍योतिष  तो पृथ्‍वी के सापेक्ष ही सभी राशियों और ग्रहों  के स्‍थान परिवर्तन की चर्चा करता है और उसके हमपर प्रभाव पर बल देता है। जाहिर है , अधिकांश पाठक इस बात को भी स्‍वीकार नहीं कर पाते।

पर इसके लिए भी मेरे अपने तर्क हैं। हमारे सौरमंडल का एक तारा सूर्य लगभग अचल है , हालांकि इधर के कुछ वर्षों में उसकी गति के बारे में भी जानकारी मिली है , पर यह गति बहुत अधिक नहीं है और वास्‍तव में यह पृथ्‍वी की गति के सापेक्ष ही परिवर्तनशील दिखाई देता है। ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में सूर्य प्रतिदिन एक डिग्री खिसक जाता है , जबकि राशि के हिसाब से प्रतिमाह एक नई राशि में प्रवेश करता है। पृथ्‍वी की वार्षिक गति के सापेक्ष ही पंचांगों में सूर्य की स्थिति में प्रतिदिन परिवर्तन देखा जाता है , जबकि दिन भर के 24 घंटों में  सूर्य की स्थिति में कोणिक परिवर्तन पृथ्‍वी की दैनिक गति के कारण ही होता है। सूर्य की ये दोनो गतियां अवास्‍तविक मानी जा सकती हैं , पर इसके फलस्‍वरूप पृथ्‍वी पर दिन भर के 24 घंटों और वर्षभर के 365 दिनों के सूर्य के अलग अलग प्रभाव को स्‍पष्‍टतया देखा जा सकता है।

पृथ्‍वी की वार्षिक गति के कारण सूर्य की स्थिति में होनेवाले परिवर्तन का प्रभाव हम देख पाते हैं। सूर्य तो 12 महीने के 365 दिनों तक एक ही स्‍थान पर है , पर उसके द्वारा पृथ्‍वी के विभिन्‍न हिस्‍सों में कभी सर्दी तो कभी गर्मी .. इस मौसम परिवर्तन का कारण पृथ्‍वी के कारण उसकी सापेक्षिक गति ही तो है। इसी प्रकार पृथ्‍वी की दैनिक गति के कारण सूर्य की स्थिति में होने वाले परिवर्तन को भी हम सहज ही महसूस कर सकते हैं। सवेरे का सूरज , दोपहर का सूरज और शाम के सूरज की गरमी का अंतर सबको पता है यानि कि अवलोकण के समय सूर्य जहां दिखाई देता है , वैसा ही प्रभाव दिखाता है।

अब चूंकि सूर्य का प्रभाव स्‍पष्‍ट है , इसमें हमारा विश्‍वास हैं , अन्‍य ग्रहों का प्रभाव स्‍पष्‍ट नहीं है , इसलिए इसे अंधविश्‍वास मान लेते है। पर एक सूर्य के उदाहरण से ही पृथ्‍वी के सापेक्ष पूरे आसमान और ग्रहों की स्थिति का प्रभाव भी स्‍पष्‍ट हो जाता है।सापेक्षिक गति के कारण होनेवाले इस एक उदाहरण के बाद ज्‍योतिष के इस आधार में कोई कमी निकालना बेतुकी बात होगी। पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए आसमान को 12 भागों में बांटा जाना और उसमें स्थित ग्रह नक्षत्र के प्रभाव की चर्चा करना पूर्ण तौर पर विज्ञान माना जा सकता है , जिसकी चर्चा लगातार होगी।

Friday, 11 June 2010

ज्‍योतिष में पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए पूरे ब्रह्मांड का अध्‍ययन किया जाता है !!









मेरे द्वारा पत्र पत्रिकाओं में ज्‍योतिष से संबंधित जितने भी लेख छपे , वो सामान्‍य पाठकों के लिए न होकर ज्‍योतिषियों के लिए थे। यहां तक कि मेरी पुस्‍तक भी उन पाठकों के लिए थी , जो पहले से ज्‍योतिष का ज्ञान रखते थे।यही कारण है कि मैं ब्‍लॉग के पाठकों के लिए जनोपयोगी लेख जलखा करती हूं। इधर कुछ वर्षों से ज्‍योतिष में प्रवेश करने के लिए एक पुस्‍तक की मांग बहुत पाठकों द्वारा की जा रही है , क्‍यूंकि इसके बिना वे मेरी पुरानी पुस्‍तक को समझने में समर्थ नहीं हैं। वैसे तो ज्‍योतिष में प्रवेश करने के लिए बाजार में पुस्‍तकों की कमी नहीं , जिसका रेफरेंस मैं अपने पाठकों को देती आ रही हूं , पर अधिक वैज्ञानिक ढंग से पाठकों को ज्‍योतिष की जानकारी दी जा सके , इसलिए मैं इस ब्‍लॉग में खेल खेल में वैज्ञानिक ढंग से ज्‍योतिष की जानकारी देने का प्रयास रही हूं , आप सबों का साथ मिले तो मेरा प्रयास अवश्‍य सफल होगा।

हमारे लिए हमारी यह धरती कितनी भी बडी क्‍यूं न हो , पर इतने बडे ब्रह्मांड में इसकी स्थिति एक विंदू से अधिक नहीं है और इसके चारो ओर फैला है विस्‍तृत आसमान। हमारे ऋषि महर्षियों ने पृथ्‍वी को एक विंदू के रूप में मानते हुए 360 डिग्री में फैले आसमान को 30-30 डिग्री के 12 भागों में बांटा था। इन्‍ही 12 भागों को राशि कहा जाता है , जिनका नामकरण मेष , वृष , मिथुन , कर्क , सिंह , कन्‍या , तुला , वृश्चिक , धनु , मकर , कुंभ और मीन के रूप में किया गया है। यह ज्‍योतिष का एक मुख्‍य आधार है और इन्‍हीं राशियों तथा उनमें अनंत की दूरी तक स्थित ग्रहों के आधार पर ज्‍योतिष के सिद्धांतों की सहायता से भविष्‍यवाणियां की जाती है।

पर हमेशा से ही ज्‍योतिष विरोधी ज्‍योतिष के इस मुख्‍य आधार को ही गलत सिद्ध करने की चेष्‍टा करते हैं। उनका मानना है कि ज्‍योतिष पृथ्‍वी को अचल मानते हुए अपना अध्‍ययन शुरू करता है , जबकि पृथ्‍वी सूर्य के चारो ओर चक्‍कर लगाती है। विरोधी यह मानने की भूल करते हैं कि फलित ज्‍योतिष का विकास उस वक्‍त हुआ , जब लोगों को यह मालूम था कि पृथ्‍वी स्थिर है और सूर्य तथा अन्‍य तारे उसके चारो ओर चक्‍कर लगाती है। हमारे ऋषि मुनियों पर यह इल्‍जाम लगाना बिल्‍कुल गलत है कि उन्‍हे सत्‍य की जानकारी नहीं थी। जब उनके द्वारा विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर विभिन्‍न ग्रहों और खगोलिय स्थिति का एक एक घटी पल निकालना संभव हो चुका है , तब उनके बारे में कोई पूर्वाग्रह पालना उचित नहीं।

इस विषय पर मेरे अपने कुछ तर्क हैं। हमारी अपनी नजर या दृष्टि हमारे शरीर को स्थिर मानकर ही आसपास की परिस्थितियों या दृश्‍यों का अवलोकण करती है, चाहे हमारा शरीर गतिशील ही क्‍यूं न हो। हम सडक पर किसी के साथ चल रहे हों और उसकी गति अधिक हो जाए तो हम अपने को पीछे मानने लगते हैं , यह जानते हुए कि हम पीछे नहीं हैं, अपने घर से काफी आगे बढ चुके हैं। विपरीत स्थिति में हम उसे पीछे मानेंगे , इसका अर्थ यह है कि हम अपने शरीर को स्थिर मानते हुए ही आसपास का जायजा लेते हैं। इसलिए तो भौतिक विज्ञान में भी सापेक्षिक गति की अवधारणा है।

किसी भी वस्‍तु की सापेक्षिक गति हमारी इसी सोंच का परिणाम है। इसी प्रकार हम गाडी में बैठे हों तो न सिर्फ पेड पौघों को गतिशील देख आश्‍चर्यित होते हैं , वरन् यह भी कह बैते हैं कि ‘अमुक शहर , अमुक गांव या अमुक मुहल्‍ला आ गया’, जबकि वो शहर , गांव या मुहल्‍लावहां पहले से होता है। इसी नियम के तहत् जब हमें ब्रह्मांड और आकाश में बिखरे अगणित तारों का अध्‍ययन करना होता है , तो हम पृथ्‍वी को स्थिर और आसमान के सभी राशियों और ग्रहों तारों को गतिशील मान लेते हैं , जो अज्ञानता नहीं मानी जा सकती है।