Saturday, 2 October 2010

आइए आज जन्‍मकालीन चंद्रमा के प्रभाव के बारे में कुछ जानते हैं !!

व्‍यस्‍तता के कारण इधर काफी दिनों से इस ब्‍लॉग को अपडेट नहीं कर पा रही थी , कल इस बारे में हेम पांडेय जी की भी टिप्‍पणी मिली। वास्‍तव मेंपरंपरागत ज्‍योतिष के जिन तथ्‍यों को हमने गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के आधार के तौर पर लिया है , उसके बारे में चर्चा भी आवश्‍यक है। उसके बाद ही ज्‍योतिष के हमारे 'गत्‍यात्‍मक पक्ष' को समझा जा सकता है। अभी तक आसमान में 12 भागों में विभाजन के रूप में बनीं राशियों उस आधार पर बच्‍चे के लग्‍न , सूर्यराशि , चंद्र राशि आदि के निर्धारण के बारे में बताया जा चुका है। जन्‍मकुंडली निर्माण के लिए आवश्‍यकसभी तालिकाऔर पंचांग ज्‍योतिष की विभिन्‍न पुस्‍तकों में मिल जाते हैं , इसलिए उनकी चर्चा न कर मैं सीधा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के फलित के भाग में आती हूं।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से चंद्रमा हमारे सबसे निकट का ग्रह है और इसलिए इसका मनुष्‍य के जीवन में क्षणिक ही सही , पर सबसे अधिक प्रभाव है। खासकर यह हमारे मन को ही प्रभावित करता है , इसलिए हमारे मन को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएं दुर्घटनाएं इसी के कारण होती है। इसके अलावे हम सभी महसूस करते हैं कि बचपन के मनोवैज्ञानिक विकास में बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य , मिलनेवाले प्‍यार दुलार और  आसपास के वातावरण का बहुत बडा प्रभाव होता है। बचपन और कुछ से नहीं , मन के सुख दुख से प्रभावित होता है , इसलिए मनुष्‍य के बालपन में चंद्रमा का खासा महत्‍व होता है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में चंद्रमा की शक्ति का निर्णय इसके आकार के हिसाब से किया जाता है। चंद्रमा जब बडा हो , यानि पूर्णिमा का हो , वह सबसे अधिक शक्ति संपन्‍न होगा। इसके अतिरिक्‍त छोटा यानि अमावस्‍या का चंद्रमा सबसे शक्तिहीन होता है। इस तरह जैसे जैसे चंद्रमा का आकार छोटा होता जाता है , उसकी शक्ति कम होती जाती है। यही कारण है कि पूर्णिमा के आसपास जन्‍म लेने वाले बच्‍चों के समक्ष घर परिवार में कुछ अधिक ही लाड प्‍यार का माहौल मिलता है , इस कारण उनकी जिद की प्रवृत्ति भी बढती है , वैसे मनोवैज्ञानिक विकास सही होने के कारण ऐसे बच्‍चे अपनी बात आगे रखने में अधिक सक्षम होते हैं। जबकि अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवालों के समक्ष ऐसा वातावरण होता है कि जरूरत के हिसाब से उनके लाड प्‍यार में कुछ कमी हो जाती है। मन में कुछ भावनाओं के दबे होने से उनका मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होता है , जिसका प्रभाव बाद के जीवन में भी देखा जाता है।

वैसे तो चंद्रमा का कुंडली के विभिन्‍न स्‍थानों पर बैठना भी महत्‍व रखता है , पर शक्ति के अनुसार चंद्रमा के फल में हमें काफी सटीकता मिली है। वैसे तो मजबूत या कमजोर चंद्रमा का प्रभाव बचपन में पूरे माहौल में नजर आता है , पर अधिक असर उन भावों पर होता है , जिनका स्‍वामी चंद्र हो या जिस भाव में चंद्र की स्थिति हो। चंद्रमा मजबूत हो , तो जिस भाव का स्‍वामी हो और जिस भाव में स्थित हो , जीवन में उससे संबंधित फल मजबूत प्राप्‍त होता है। खासकर बचपन में इसका असर खूब देखने को मिलता है।

इसके विपरीत चंद्रमा कमजोर हो , तो जिस भाव का स्‍वामी हो और जिस भाव में स्थित हो , जीवन में उससे संबंधित ऋणात्‍मक फल मिलता है। इसका असर भी बचपन में ही अधिक देखने को मिलता है। आज के लेख के हिसाब से अष्‍टमी में जन्‍म लेने वाले बच्‍चों के चंद्रमा का फल आप नहीं समझ पाएंगे , पर इतना अवश्‍य है कि अष्‍टमी के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चो के समक्ष माहौल ऐसा होता है कि वे मन से बहुत ही संतुलित होते हैं । और खासकर यह संतुलन उन मामलों में अधिक दिखाई पडता है , जिन मामलों का स्‍वामी चंद्रमा होता है और जिस भाव में वो स्थित होता है।

3 comments:

  1. पिछले कई दिनों से इस ब्लाग का अवलोकन हो रहा है.. लेकिन आज चन्द्रमा को देख कर ठहर सा गया... मैं तो पंचमी के दिन अवतरित हुआ था... पता नही मेरे लिए क्या कैसे होगा...

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  2. अर्थात कृष्ण पक्ष की नवमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी तक की जन्मतिथि वाले जातक का चन्द्रमा कमजोर माना जाएगा | यदि मैंने गलत निष्कर्ष निकाला है तो कृपया संशोधन करने का कष्ट करें |

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  3. अमावस्‍या के तीन दिन पहले से लेकर तीन दिन बाद तक चंद्र कमजोर माना जा सकता है .. जबकि पूर्णिमा के तीन दिन पहले से लेकर तीन दिन बाद तक चंद्र मजबूत होता है .. 80 प्रतिशत केस में आसपास जनम लेनेवाले बच्‍चों के चंद्र की स्थिति को भी आसपास ही माना जा सकता है .. पर 20 प्रतिशत केस में कुछ खास गणना की जरूरत है .. जिसे अभी नहीं समझा जा सकता .. आगे उल्‍लेख किया जाएगा !!

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