Monday, 28 June 2010

क्‍या नक्षत्र तारों का समूह होता है ??

सामान्‍य लोग 'नक्षत्र ' शब्‍द को तारे या तारे के समूह के लिए ही प्रयोग करते हैं , पर ज्‍योतिष में 'नक्षत्र' का यह अर्थ नहीं है। आसमान में 30 डिग्री का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले राशि की तरह नक्षत्र भी पूरे गोलाकार आसमान के 360 डिग्री को 27 भागों में बांटने से बने 13 डिग्री 20 मिनट की कोणिक दूरी का प्रतिनिधित्‍व करता है। जिस प्रकार एक राशि को पहचानने और उसे याद रखने के लिए उसमें स्थित तारा समूहों को लेकर एक खास आकार दिया गया है , उसी प्रकार नक्षत्रों को पहचानने के लिए भी उसमें स्थित तारा समूहों को याद रखा जाता है , पर नक्षत्र ताराओं का समूह नहीं होता , जैसा कि लोगों के मन में भ्रम है।

आसमान के 12 भागों में बंटवारा कर देने के बाद भी ऋषि मुनियों ने इसके और सूक्ष्‍म अध्‍ययन के लिए इसे 27 भागों में बांटा , जिससे 13 डिग्री 20 मिनट का एक एक नक्षत्र निकला। आकाश में चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा पर चलता हुआ 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है, इस तरह चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र को पार करता है। किसी व्‍यक्ति‍ का जन्‍म नक्षत्र वही होता है , जहां उसके जन्‍म के समय चंद्रमा होता है। ऋषि मुनि ने व्‍यक्ति के जन्‍म के नक्षत्र को बहुत महत्‍व दिया था , और इसके अध्‍ययन के लिए हर नक्षत्र के प्रत्‍येक चरण के लिए अलग अलग 'अक्षर' रखे थे। बच्‍चे के नाम में पहला अक्षर नक्षत्र का ही हुआ करता था, जिससे एक नक्षत्र के बच्‍चे को बडे होने के बाद भी अलग किया जा सकता था।  शायद बडे स्‍तर पर रिसर्च के लिए ऋषि मुनियों ने यह परंपरा शुरू की हो।

0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है ..  अश्विनी , भरणी , कृत्तिका , रोहिणी , मॄगशिरा , आद्रा , पुनर्वसु , पुष्य  , अश्लेशा , मघा , पूर्वाफाल्गुनी , उत्तराफाल्गुनी , हस्त  , चित्रा , स्वाती , विशाखा , अनुराधा , ज्येष्ठा , मूल , पूर्वाषाढा , उत्तराषाढा ,  श्रवण , धनिष्ठा , शतभिषा , पूर्वाभाद्रपद , उत्तराभाद्रपद , रेवती । अधिक सूक्ष्‍म अध्‍ययन के लिए एक एक नक्षत्र को पुन: चार चार चरणों में बांटा गया है। चूंकि राशि बारह हैं , और नक्षत्र 27 , और सबके चार चार चरण। इसलिए एक राशि के अंतर्गत किन्‍ही तीन नक्षत्र के 9 चरण आ जाते हैं । विवाह के समय जन्‍म कुंडली मिलान के लिए वर और वधू के जन्‍म नक्षत्र का ही सबसे अधिक महत्‍व होता है।

आसमान में सूर्य जब इन नक्षत्रों को पार करता रहता है , तो मौसम के लिए इन नक्षत्रों का प्रयोग किया जाता है। चूंकि सूर्य की गति एक डिग्री प्रतिदिन की है , इसलिए एक एक नक्षत्र को पार करने में इसे लगभग 13 दिन ही लगते हैं। लगभग का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी के अंडाकार पथ होने से सारे नक्षत्रों को पार करने में अलग अलग समय लगता है। हर नक्षत्रों से होते हुए सूर्य 22 जून से आर्द्रा में चल रहा है , जो 6 जुलाई से पुनवर्सु में , 20 जुलाई से पुष्‍य में , 3 अगस्‍त से अश्‍लेषा में चलने के बाद 17 अगस्‍त को मघा में प्रवेश के बाद 30 अगस्‍त को पूर्वा फाल्‍गुनी नक्षत्र में प्रवेश करेगा। मौसम की चर्चा में भी आपने इन नक्षत्रों का नाम अवश्‍य सुना होगा।

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Sunday, 27 June 2010

हर माह अमावस्‍या और पूर्णिमा अलग अलग राशियों में होती है !!

कल के आलेख में हमने जाना कि जितने दिनों तक सूर्य एक राशि में होता है , उतने दिनों में चंद्रमा पूरे आकाश का चक्‍कर लगा लेता है और इस तरह जन्‍मकुंडली में सूर्य के सापेक्ष चंद्रमा की स्थिति को देखते हुए हिंदी माह की तिथियों का आकलन किया जा सकता है। सभी राशियों में घूमते हुए एक माह बाद जबतक चंद्रमा सूर्य के नजदीक पहुंचने को होता है , तो सूर्य एक राशि आगे बढ चुका होता है। इस तरह अगले माह की अमावस्‍या पिछले माह में होनेवाली राशि से एक राशि बाद ही हो पाती है। सूर्य के एक राशि आगे बढ जाने से उसके सामने चंद्रमा को जाने में भी एक राशि आगे बढना पडता है और इस तरह अगले माह की पूर्णिमा भी एक राशि बाद ही होती है।

अब चूंकि 15 अप्रैल से 15 मई तक सूर्य मेष राशि में होता है , उस मध्‍य जब चंद्रमा मेष राशि में पहुंचेगा , तो अमावस्‍या होगी , इस कारण अमावस्‍या मेष राशि में ही होगी। उससे छह राशि आगे जाकर ही चंद्रमा सूर्य के सामने हो सकेगा , इस कारण इस माह में पूर्णिमा तुला राशि में होगी। इसी प्रकार 15 मई से 15 जून के मध्‍य सूर्य के वृष राशि में होने से उस मध्‍य अमावस्‍या वृष राशि में और पूर्णिमा वृश्चिक राशि में होती है। इसी नियम से 15 जून से 15 जुलाई के मध्‍य अमावस्‍या मिथुन राशि में तथा पूर्णिमा धनु राशि में , 15 जुलाई से 15 अगस्‍त के मध्‍य अमावस्‍या कर्क राशि में और पूर्णिमा मकर राशि में, 15 अगस्‍त से 15 सितंबर के मध्‍य अमावस्‍या सिंह राशि में और पूर्णिमा कुंभ राशि में , 15 सितंबर से 15 अक्‍तूबर के मध्‍य अमावस्‍या कन्‍या राशि में और पूर्णिमा मीन राशि में होती है।

यही क्रम आगे बढता जाता है और 15 अक्‍तूबर से 15 नवंबर के मध्‍य अमावस्‍या तुला राशि में और पूर्णिमा मेष राशि में , 15 नवंबर से 15 दिसंबर के मध्‍य अमावस्‍या वृश्चिक राशि में और पूर्णिमा वृष राशि में , 15 दिसंबर से 15 जनवरी के मध्‍य अमावस्‍या धनु राशि में और पूर्णिमा मिथुन राशि में , 15 जनवरी से 15 फरवरी के मध्‍य अमावस्‍या मकर राशि में और पूर्णिमा कर्क राशि में , 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्‍य अमावस्‍या कुंभ राशि में और पूर्णिमा सिंह राशि में तथा 15 मार्च से 15 अप्रैल के मध्‍य अमावस्‍या मीन राशि में और पूर्णिमा कन्‍या राशि में हुआ करता है। इस तरह हर माह अमावस्‍या तथा पूर्णिमा अलग अलग राशियों में हुआ करता है ।

Friday, 25 June 2010

जन्‍मकुंडली से तिथि का अनुमान किया जा सकता है !!

ज्‍योतिष जैसे गूढ विषय को सैद्धांतिक रूप में नहीं , यानि किताबी भाषा में नहीं , व्‍यावहारिक तौर पर लेख के द्वारा समझाने का प्रयास करना आसान नहीं, भाषा के हेरफेर से कुछ त्रुटि रह ही जाती है , पिछले पोस्‍ट पर हुई ऐसी ही गलती पर हमारा ध्‍यान दिनेश राय द्विवेदी जी ने आकृष्‍ट किया। निंदक के तौर पर उनकी टिप्‍पणियों के मिलने से आप सबों की जानकारी में अवश्‍य वृद्धि होगी। वैसे उनके द्वारा टिप्‍पणी की गयी भाषा में थोडी तल्‍खी अवश्‍य है, जो किसी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होने पर स्‍वाभाविक रूप से आ जाती है, इसलिए इसे इग्‍नोर करना ही मैं उचित समझती हूं।

दरअसल अपने ब्‍लॉग के सामान्‍य पाठकों को अभी पंचांग के बारे में जानकारी देने का मेरा इरादा नहीं था , अभी तक लिखे गए आलेखों में जन्‍मकुंडली को देखकर आसमान की स्थिति , लग्‍न , जन्‍म समय , सूर्यराशि और चंद्रराशि निकालने के बारे में जानकारी देने के बाद इस आलेख के द्वारा मैं तो मात्र यह समझाना चाह रही थी कि किसी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखते हुए आप जन्‍म के महीने का मोटामोटी अंदाजा किस प्रकार लगा सकते हैं , जिस दिन आपलोगों को पंचांग के बारे में जानकारी मिलेगी , बहुत कुछ समझ में आ ही जाएगा।

जैसा कि अबतक हम समझ चुके , सूर्य एक एक महीने प्रत्‍येक राशि में होता है , उस एक महीने के दौरान चंद्रमा सभी राशियों का चक्‍कर लगा लेता है। चंद्रमा को 360 डिग्री की इन बारहों राशियों को पार करने में लगभग 30 दिन लगते हैं , क्‍यूंकि वह ढाई ढाई दिनों तक एक राशि में रहता है। जब जन्‍मकुंडली में सूर्य और चंद्र एक साथ हो , तो वह अमावस्‍या या उसके आसपास का दिन होता है , जबकि जन्‍मकुंडली में सूर्य और चंद्र आमने सामने हो , तो वह पूर्णिमा या उसके आस पास का दिन होता है।

जन्‍मकुंडली में सूर्य से दूर होते हुए चंद्रमा को देखकर आप शुक्‍ल पक्ष की विभिन्‍न तिथियों का अंदाजा लगा सकते हैं। सूर्य से एक खाने बाद रहने वाले चंद्र से तृतीया के आसपास , सूर्य से दो खाने बाद रहने वाले चंद्र से पंचमी के आसपास , सूर्य से तीन खाने बाद रहने वाले चंद्र से अष्‍टमी के असपास , सूर्य से चार खाने बाद रहने वाले चंद्र से दशमी के आसपास , सूर्य से पांच खाने बाद रहने वाले चंद्र से त्रयोदशी के आसपास और सूर्य के सामने रहने वाले चंद्रमा से पूर्णिमा के आसपास की तिथि में बालक का जन्‍म समझा जा सकता है।

इस तरह जन्‍मकुंडली में सूर्य की ओर प्रवृत्‍त होते चंद्रमा को देखकर आप कृष्‍ण पक्ष की विभिन्‍न तिथियों का आकलन कर सकते हैं । सूर्य से पांच खाने पहले रहनेवाले चंद्र से तृतीया के आसपास , सूर्य से चार खाने पहले रहने वाले चंद्र से पंचमी के आसपास , सूर्य से तीन खाने पहले रहने वाले चंद्र से अष्‍टमी के आसपास , सूर्य से दो खाने पहले रहने वाले चंद्र से दशमी के आसपास , सूर्य से एक खाने पहले रहनेवाले चंद्र से त्रयोदशी के आसपास और सूर्य के साथ रहने वाले चंद्र से अमावस्‍या के आसपास की तिथि में बालक का जन्‍म समझा जा सकता है।

Thursday, 24 June 2010

पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषियों के अनुसार सूर्य राशि

पिछले आलेख में लिखी गयी खा‍मी की ओर डॉ महेश सिन्‍हा जी और हेम पांडेय जी ने इशारा किया। वास्‍तव में एक एक तिथि की चर्चा न कर पिछले आलेख में पूरे वर्ष के दौरान मैं मोटे तौर पर सूर्य के प्रत्‍येक राशि में एक एक महीने समझाना था , क्‍यूंकि इन एक दो दिनों के विचलन पर ध्‍यान देने में पाठकों को संकेन्‍द्रण गडबड हो सकता था।

वास्‍तव में सूर्य 15 अप्रैल को मेष राशि में जाकर 14 मई तक वहां रहकर 15 मई से 15 जून तक वृष राशि में होता है। इसी प्रकार 16 जून से 15 जुलाई तक मिथुन में, 16 जुलाई से 16 अगस्‍त तक कर्क में, 17 अगस्‍त से 17 सितंबर सिंह में, 18 सितंबर से 17 अक्‍तूबर कन्‍या में, 18 अक्‍तूबर से 16 नवंबर तुला में, 17 नवंबर से 16 दिसंबर वृश्चिक में, 17 दिसंबर से 14 जनवरी धनु में, 15 जनवरी से 12 फरवरी मकर में, 13 फरवरी से 14 मार्च कुंभ में तथा 15 मार्च से 14 अप्रैल तक मीन राशि में घूमते हुए पुन: 15 अप्रैल को मेष राशि में प्रवेश करता है। इसी के आधार पर सूर्यराशि का फैसला किया जा सकता है।
कुछ मासिक पत्रिकाओं में हर महीने की 22 या 23 तारीख को ही सूर्य का राशि परिवर्तन दिखाया जाता है , Aries (21 March-20 April)
Taurus (21 April-21 May)
Gemini (22 May-21 June)
Cancer (22 June-22 July)
Leo (23 July-22 August)
Virgo (23 August-21 September)
Libra (22 September-22 October)
Scorpio (23 October-21 November)
Sagittarius (22 November-21 December)
Capricorn (22 December-20 January)
Aquarius (21 January-19 February)
Pisces (20 February-20 March)
यानि हमारे द्वारा गणना किए जानेवाली तिथि से 24 या 25 दिन पूर्व ही , इसका कारण पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषियों द्वारा आसमान के 0 डिग्री को भारतीय ज्‍योतिषियों से 25 डिग्री पहले मान लिया जाना है। इसके कारण की चर्चा कभी बाद में , पर हमारा मत है कि हमारे ऋषियों द्वारा तय किए गए राशि वर्गीकरण में कोई खामी नहीं है और इसमें किसी प्रकार के तर्क को घुसेडने की कोई जगह नहीं।

Monday, 21 June 2010

किसी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर जन्‍म के महीने का पता लगाया जा सकता है !!

पिछले आलेख में हमने जाना कि पृथ्‍वी की घूर्णन गति के फलस्‍वरूप सूर्य 24 घंटों में एक बार आसमान के चारो ओर घूमता नजर आता है। इस कारण सूर्य की स्थिति को देखते हुए किसी भी लग्‍नकुंडली के द्वारा बच्‍चे के जन्‍म का समय निकाला जा सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं , पृथ्‍वी की परिभ्रमण गति के कारण भी सूर्य की स्थिति में परिवर्तन देखा जाता है । आसमान को 12 भागों में बांटते वक्‍त जहां पर 0 डिग्री से शुरू किया गया है , उस स्‍थान पर सूर्य प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को पहुंच जाता है और प्रतिदिन एक एक डिग्री बढता हुआ वर्षभर बाद पुन: उसी स्‍थान पर पहुंच जाता है। इस प्रकार यह एक एक महीने में 12 राशियों को पार करता जाता है।

सूर्य की स्थिति 14 अप्रैल से 14 मई तक मेष राशि में , 14 मई से 14 जून तक वृष राशि में , 14 जून से 14 जुलाई तक मिथुन राशि में 14 जुलाई से 14 अगस्‍त तक कर्क राशि में , 14 अगस्‍त से 14 सितंबर तक सिंह राशि में , 14 सितंबर से 14 अक्‍तूबर तक कन्‍या राशि में , 14 अक्‍तूबर से 14 नवंबर तक तुला राशि में , 14 नवंबर से 14 दिसंबर तक वृश्चिक राशि में , 14 दिसंबर से 14 जनवरी तक धनु राशि में , 14 जनवरी से 14 फरवरी तक मकर राशि में , 14 फरवरी से 14 मार्च तक कुंभ राशि में तथा 14 मार्च से 14 अप्रैल तक मीन राशि में होती है। 

यही कारण है कि 14 अप्रैल से 14 मई तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मेष , 14 मई से 14 जून तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि वृष , 14 जून से 14 जुलाई तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मिथुन , 14 जुलाई से 14 अगस्‍त तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि कर्क  , 14 अगस्‍त से 14 सितंबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि सिंह , 14 सितंबर से 14 अक्‍तूबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि कन्‍या , 14 अक्‍तूबर से 14 नवंबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि तुला  , 14 नवंबर से 14 दिसंबर तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि वृश्चिक , 14 दिसंबर से 14 जनवरी तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि धनु , 14 जनवरी से 14 फरवरी तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मकर , 14 फरवरी से 14 मार्च तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि कुंभ तथा 14 मार्च से 14 अप्रैल तक जन्‍म लेनेवालों की सूर्यराशि मीन होती है।

इसलिए किसी भी जन्‍मकुंडली में बालक की सूर्यराशि मेष हो तो समझ लें कि जातक ने14 अप्रैल से 14 मई के मध्‍य जन्‍म लिया है। इसी प्रकार सूर्यराशि वृष हो , तो उसके 14 मई से 14 जून के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि मिथुन हो , तो उसके 14 जून से 14 जुलाई के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि कर्क हो , तो उसके 14 जुलाई से 14 अगस्‍त के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्य राशि सिंह हो तो उसके 14 अगस्‍त से 14 सितंबर तक जन्‍म लेने , सूर्य राशि कन्‍या हो , तो उसके 14 सितंबर से 14 अक्‍तूबर के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्य राशि तुला हो , तो उसके 14 अक्‍तूबर से 14 नवंबर के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्य राशि वृश्चिक हो , तो उसके 14 नवंबर से 14 दिसंबर के मध्‍य जन्‍मलेने , सूर्य राशि धनु हो तो उसके 14 दिसंबर से 14 जनवरी के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि मकर हो , तो उसके 14 जनवरी से 14 फरवरी के मध्‍य जन्‍म लेने , सूर्यराशि कुंभ हो , तो उसके 14 फरवरी से 14 मार्च के मध्‍य जन्‍म लेने तथा सूर्यराशि मीन हो , तो उसके 14 मार्च से 14 अप्रैल के मध्‍य जन्‍म लेने की पुष्टि हो जाती है।


Friday, 18 June 2010

सिर्फ लग्‍नकुंडली से ही जातक के लग्‍न का प्रहर जाना जा सकता है !!

पिछले आलेख में चर्चा हुई थी कि किसी भी जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर बालक के जन्‍म के पहर की जानकारी कैसे प्राप्‍त की जा सकती है। इसपर एक टिप्‍पणी मिली है कि इस विधि से हम सिर्फ लग्‍न कुंडली से ही जन्‍म के समय की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं , चंद्रकुंडली और सूर्य कुंडली के आधार पर समय की जानकारी नहीं प्राप्‍त कर सकते, बिल्‍कुल सही टिप्‍पणी है। दरअसल ज्‍योतिष में जब भी सिर्फ कुंडली की चर्चा की जाती है , तो वह जन्‍मकुंडली यानि लग्‍न कुंडली ही होती है। भविष्‍यवाणियों में सटीकता लाने के लिए चंद्रकुंडली , सर्यूकुंडली या अन्‍य अनेक प्रकार की कुंडली बनाए जाने की परंपरा शुरू हुई है। लेकिन गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की माने तो आज भी लग्‍नकुंडली ही किसी व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व का दर्पण है , जो उसके पूरे जीवन के विभिन्‍न संदर्भो के सुख दुख और जीवन भर की परिस्थितियों के उतार और चढाव की जानकारी दे सकता है, जिसपर चर्चा करने में अभी कुछ समय तो अवश्‍य लगेगा। भविष्‍यवाणी करने के लिए चंद्र कुंडली , सूर्यकुंडली या सूक्ष्‍मतर रूप से बनाए जाने वाले अन्‍य कुंडलियों का भी आंशिक प्रभाव माना ही जा सकता है।
वैसे चाहे लग्‍नकुंडली हो, चंद्र कुंडली हो, सूर्य कुंडली हो या अन्‍य कोई भी कुंडली , बालक के जन्‍म के समय आसमान में ग्रहों की जो स्थिति होती है , उसी को दर्शाया जाता है , सिफर् अलग अलग खाने को महत्‍व देने से ये कुंडलियां परिवर्तित हो जाती हैं। जिस खाने को महत्‍व दिया जाए , उसे सबसे ऊपर यानि मस्‍तक पर रख दिया जाता है। जब हम लग्‍न को महत्‍व देते हैं , लग्‍नवाले खाने को ऊपर रखते हैं , इससे लग्‍नकुंडली बन जाती है। जब हम चंद्र को महत्‍व देते हैं , चंद्र वाले खाने को ऊपर रखते हैं , चंद्रकुंडली बन जाती है। जब हम सूर्य को महत्‍व देते हैं , सूर्य वाले खाने को ऊपर रखते हैं , सूर्यकुंडली बन जाती है। इसी प्रकार अन्‍य ग्रहों को भी महत्‍व देते हुए आप अन्‍य प्रकार की कुंडली बना सकते हैं , पर उसमें अन्‍य ग्रहों की स्थिति में हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। नीचे एक जातक की तीनो कुंडलियां देखिए , प्रत्‍येक कुंडली में ग्रहों की स्थिति समान जगह पर है , सिर्फ उन्‍हें अपने तरीके से घुमा दिया गया है। ये है लग्‍नकुंडली ....

                                   
ये है चंद्रकुंडली ........

और ये है सूर्यकुंडली ....

                                      
जैसा कि पहले भी लिखा जा चुका है , सूर्य कुंडली या चंद्र कुंडली तो ढाई दिनों तक पूरे 24 घंटों तक जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के लिए एक ही बनेगी , सिर्फ लग्‍न कुंडली ही मात्र दो घंटे तक यानि पूर्वी क्षितिज में एक लग्‍न के उदय होने तक एक सी रहती है , इसलिए यही बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज की जानकारी दे पाती है , यही कारण है कि इसी कुंडली से बालक के जन्‍म के समय को जाना जा सकता है। 

Thursday, 17 June 2010

जन्‍मकुंडली से जन्‍म के प्रहर का अनुमान किया जा सकता है !!

ज्‍योतिष आम लोगों के लिए बिल्‍कुल नया विषय है और हममें से सभी लोगों के दिमाग में यह बात पहले से है कि यह बहुत ही जटिल विषय है , इसलिए ज्‍योतिष सीखा ही नहीं जा सकता। लेकिन बात ऐसी नहीं है , ज्‍योतिष के सारे नियम जटिल क्‍यूं कर होंगे , अब हमें जिस विषय का विशेषज्ञ बनना होता है , उसी में विशिष्‍टता हासिल करते हैं , पर बाकी विषयों की भी सामान्‍य जानकारी तो रखते ही हैं। ज्‍योतिष में भी सामान्‍य जानकारी रखना बहुत कठिन नहीं है , सिर्फ अपनी जिज्ञासाओं को हमारे सामने अवश्‍य रखें और इस ज्ञान को प्राप्‍त करने में आगे बढते जाएं। जैसा कि मैं पुराने लेखों में भी लिख चुकी हूं कि पृथ्‍वी की पश्चिम से पूर्व की ओर अपने अक्ष पर घूमने के कारण ही आसमान की एक चौडी पट्टी पूरब से पश्चिम की ओर जाती दिखती है और उसी पट्टी के 360 डिग्री के 12 भाग कर 12 राशियां निकाले गए हैं । इसी चौडी पट्टी में सभी ग्रह कभी थोडा उत्‍तर और कभी थोडा दक्षिण होते हुए उदित होते हैं और आगे बढते हुए अस्‍त भी हो जाते हैं। बालक के जन्‍म के समय इसी पट्टी में स्थित ग्रहों को उसी अनुसार रखते हुए उसकी जन्‍मकुंडली बनायी जाती है , जिसके बारे में मैने पुराने लेख में लिखा था।

एक सूर्य को ही लें , पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण सूर्य 24 घंटे में पृथ्‍वी का पूरा चक्‍कर लगाता दिखता है। जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखते हुए आप आकलन कर सकते हैं कि उक्‍त बच्‍चे का जन्‍म किस वक्‍त हुआ है । पिछले दिन दिए गए चार्ट में सूर्य लग्‍नराशि वाले खाने में था , जो पूरब की दिशा का द्योतक होता है। इसका अर्थ यह है कि बालक के जन्‍म के समय सूर्य पूरब दिशा में था , पूरब दिशा में सूर्य सवेरे होता है , इसलिए बालक का जन्‍म सवरे यानि सूर्योदय के आसपास हुआ है। अब कुंडली में यहां से सूर्य जैसे जैसे एक एक खाने सरकता जाएगा , जातक का जन्‍म समय में सूर्योदय से दो दो घंटे का अंतर होता जाएगा । मध्‍य आकाश वाली राशि पर सूर्य के होने का अर्थ है कि जातक का जन्‍म दोपहर के आसपास हुआ है। पुन: कुंडली में उससे आगे एक एक राशि में सूर्य के बढने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म दोपहर के दो घंटे बाद या चार घंटे बाद हुआ है। इसी प्रकार पश्चिमी क्षितिज की राशि में सूर्य के होने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म सूर्यास्‍त का है , जबकि विपरीत दिशा के आकाश की ओर सूर्य के होने का अर्थ है कि बालक का जन्‍म मध्‍य रात्रि का है।

इस चित्र के माध्‍यम से अच्‍छी तरह समझाया गया है कि जन्‍मकुंडली में सूर्य की स्थिति को देखकर आकलन किया जा सके कि उसका जन्‍म किस वक्‍त हुआ था।  ज्‍योतिषी भले ही पंचांगों को देखकर जन्‍मकुंडली बना लेते हो , यह सामान्‍य जानकारी उनमें से भी बहुतों को नहीं मालूम होती है। आनेवाले समय में किसी कुंडली के चक्र को देखकर ही आप बता सकते हैं कि जिसकी कुंडली है , उसका जन्‍म किस बेला में हुआ था। है न आम व्‍यक्ति के लिए बहुत रोचक जानकारी ??

Wednesday, 16 June 2010

जन्‍मकुंडली बच्‍चे के जन्‍म के समय का पूरे आसमान का चित्र है !!

कल के आलेख से हमें जानकारी मिली कि आसमान के गोलाकार 360 डिग्री के 12 भाग कर 12 राशियां बना दी गयी है। अभी तक तो आपको इनके नाम भी याद हो गए होंगे। जन्‍मकुंडली में जिस खाने में 1 लिखा होता है , वह मेष राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है , जहां 2 लिखा होता है , वह वृष राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है , इसी प्रकार जिस खाने में 3 लिखा हो , वह मिथुन , जिस खाने में 4 लिखा हो , वह कर्क , जिस खाने में 5 लिखा हो , वो सिंह , जिस खाने में 6 लिखा हो , वो कन्‍या , जिस खाने में 7 लिखा हो , वह तुला , जिस खाने में 8 लिखा हो , वह वृश्चिक ,जहां 9 लिखा हो , वह धनु , जहां 10 लिखा हो , वह मकर , जहां 11 लिखा हो , वह कुंभ तथा जहां 12 लिखा हो , वह खाना मीन राशि का प्रतिनिधित्‍व करता है। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रह इन्‍हीं 12 राशियों में घडी के कांटो की दिश्‍श में घूमते हुए दिखाई देते हैं ।

चूंकि किसी व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली उसके जन्‍म के समय आसमान के बारहो राशियों और सभी ग्रहों की स्थिति को दिखलाती है , इसलिए उसमें बारहो राशियों और सारे ग्रहों का उल्‍लेख होगा ही। जन्‍मकुंडली में सभी ग्रहों को एक एक अक्षर में लिखा जाता है। सूर्य के लिए सू , चंद्रमा के लिए चं , बुध के लिए बु , मंगल के लिए मं , शुक्र के लिए शु , बृहस्‍पति के लिए बृ , शनि के लिए श , राहू के लिए रा और केतु के लिए के का प्रयोग किया जाता है। इसलिए जन्‍मकुंडली में बारह खाने के रूप में सभी राशियां तथा किसी न किसी राशि में संक्षिप्‍त रूप में नवों ग्रह दिखाई देंगे। जन्‍मकुंडली में  जिस राशि में सूर्य हो , वह व्‍यक्ति की सूर्य राशि तथा जिस राशि में चंद्र हो , वह व्‍यक्ति की चंद्र राशि होगी । किसी व्‍यक्ति के लग्‍नराशि को जानने के लिए कुंडली चक्र को सीधा रखकर उसके सबसे ऊपर मध्‍य खाने में लिखे अंक को देखना चाहिए।

संलग्‍न चित्र से यह स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि किसी की जन्‍मकुंडली में स्थित मध्‍य विंदू हमारी पृथ्‍वी होती है , सबसे ऊपर में मध्‍य का खाना बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज को दर्शाता है , इसलिए उसमें लिखे अंक वाली राशि ही बालक की लग्‍नराशि होती है। इसके अलावे सबसे नीचे का खाना बालक के जन्‍म के समय पश्चिमी क्षितिज को दर्शाता है । दायीं ओर का खाना जातक की ओर के मध्‍य आकाश तथा तथा बायीं ओर का खाना पृथ्‍वी के उल्‍टी ओर के मध्‍य आकाश को दर्शाता है। इसलिए जन्‍मकुंडली में सबसे ऊपर के मध्‍य वाले खाने में कोई ग्रह दिखाई दें , तो समझना चाहिए कि उस ग्रह का उदय भी बच्‍चे के जन्‍म के साथ ही हो रहा था। इसी प्रकार सबसे नीचे के खाने में कोई ग्रह हो , तो समझना चाहिए कि वह ग्रह बच्‍चे के जन्‍म के समय पश्चिमी क्षितिज पर चमकते हुए अस्‍त होने को था। इसी प्रकार अन्‍य खानों और उनमें स्थित राशियों का भी अर्थ लगाया जा सकता है।



अभी तक की ज्‍योतिषीय जानकारी के बाद पाठकों से यह अपेक्षा रखूंगी कि वो बताएं कि ऊपर दिए गए जन्‍मकुंडली के अनुसार जातक की लग्‍न राशि , सूर्य राशि या चंद्र राशि क्‍या होगी , उसके जन्‍म के समय कौन से ग्रह उदय हो रहे थे , कौन से अस्‍त हो रहे थे और कौन से ग्रह मध्‍य आकाश में चमक रहे थे।                     

Sunday, 13 June 2010

भचक्र की राशियों में से तीन हमारे लिए बहुत महत्‍वपूर्ण

आज एक बार फिर से शीर्षक में परिवर्तन करते हुए पिछली कडी को आगे बढा रही हूं। हमारा सामना अक्‍सर कुछ वैसे लोगों से होता है , जो ऐसे तो कभी ग्रहों या ज्‍योतिष पर विश्‍वास नहीं करते , पर जब कभी लंबे समय तक चलने वाली किसी विपत्ति में फंसते हैं , ज्‍योतिष पर अंधविश्‍वास ही करने लगते हैं। ऐसी हालत में उनकी परेशानियां दुगुनी तिगुणी बढने लगती है ,अपनी समस्‍याओं में त्‍वरित सुधार लाने के लिए वे उस समय हम जैसों की अच्‍छी सलाह भी नहीं मानते। ज्ञान हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन करती है , ज्‍योतिष को जानने के बाद आप स्‍वयं सही निर्णय ले सकते हैं। यही सोंचकर मै अधिक से अधिक लोगों को खेल खेल में ज्‍योतिष सीखलाने की बात सोंच रही हूं , आप सबों का सहयोग मुझे अवश्‍य सफलता देगा।


पिछले लेखमाला में हमने सीखा कि ज्‍योतिष में पृथ्‍वी के सापेक्ष पूरे भचक्र का अवलोकण किया जाता है , साथ ही सूर्य के उदाहरण से समझने में सफलता मिली कि विभिन्‍न पिंड पृथ्‍वी सापेक्ष अपनी स्थिति के अनुरूप ही पृथ्‍वी पर प्रभाव डालते हैं। पहले ही लेख में चर्चा की गयी है कि पृथ्‍वी को स्थिर मानकर पूरे आसमान के 360 डिग्री को 12 भागों में बांटने से 30 - 30 डिग्री की 12 राशियां बनती है। आमान के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक को मेष , 30 डिग्री से 60 डिग्री तक को वृष , 60 डिग्री से 90 डिग्री तक को मिथुन , 90 डिग्री से 120 डिग्री तक को कर्क , 120 डिग्री से 150 डिग्री तक को सिंह , 150 से 180 डिग्री तक को कन्‍या , 180 से 210 डिग्री तक को तुला , 210 से 240 डिग्री तक को वृश्चिक , 240 से 270 डिग्री तक को धनु , 270 डिग्री से 300 डिग्री तक को मकर , 300 से 330 डिग्री तक को कुंभ तथा 330 से 360 डिग्री तक को मीन कहा जाता है।
 
हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के 0 डिग्री एक आधार को लेकर निश्चित किया गया था , पर कुछ ज्‍योतिष विरोधी हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के अध्‍ययन के लिए किए गए इस विभाजन को भी अवास्‍तविक मानते हैं , पर मेरे अनुसार यह विभाजन ठीक उसी प्रकार किया गया है , जिस प्रकार पृथ्‍वी के अध्‍ययन के लिए हमने आक्षांस और देशांतर रेखाएं खींची हैं। जिस प्रकार भूमध्‍य रेखा से ही 0 डिग्री की गणना की जानी सटीक है तथा देशांतर रेखाओं  की शुरूआत और अंत दोनो ध्रुवों पर करना आवश्‍यक है , उसी प्रकार आसमान में किसी खास विंदू से 0 डिग्री शुरू कर चारो ओर घुमाते हुए 360 डिग्री तक पहुंचाया गया है , हालांकि यह विंदू भी ज्‍योतिष में विवादास्‍पद बना हुआ है , जिसका कोई औचित्‍य नहीं। पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण 24 घंटों में ये बारहों राशियां पूरब से उदित होती हुई पश्चिम में अस्‍त होती जाती है।
 
यूं तो ये बारहों राशियां और इनमें स्थित ग्रह हमारे लिए महत्‍वपूर्ण हैं , पर तीन राशियां सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण होती हैं। पहली, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय सूर्य होता है , वो उसकी सूर्य राशि कहलाती है। दूसरी, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय चंद्रमा होता है , वो उसकी चंद्र राशि कहलाती है। तीसरी, जिस राशि का उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता है, वह बालक की लग्‍न राशि कलाती है। एक महीने तक सूर्य एक ही राशि में होता है , इसलिए एक महीने के अंदर जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक सूर्य राशि में आ जाते हैं। ढाई दिनों तक चंद्रमा एक ही राशि में होता है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक ही चंद्र राशि में आते हैं। दो घंटे तक एक ही लग्‍न उदित होती रहती है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी बच्‍चे एक ही लग्‍न राशि में आ जाते हैं।

Saturday, 12 June 2010

अचल होते हुए भी पृथ्‍वी की गति के सापेक्ष सूर्य का प्रभाव पडता है !!

कल के ही लेख को आगे बढाने का प्रयास कर रही हूं , पर एक टिप्‍प्‍णी के कारण शीर्षक में से वैज्ञानिक दृष्टिकोण हटा दिया जा रहा है। जब भी मैं ज्‍योतिष को विज्ञान कहती हूं , उनलोगों को कष्‍ट पहुंचता है , जो मोटे मोटे किताबों में लिखे वैज्ञानिकों खासकर विदेशियों के सिद्धांतों को ही विज्ञान मानते हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा परंपरागत अनुभव के आधार पर विकसित किए गए नियमों और खासकर हमारे ऋषि मुनियों के ज्ञान का इनके लिए कोई महत्‍व नहीं। और किसी को कष्‍ट पहुंचे , ऐसा कोई काम मैं नहीं करना चाहती , यदि ज्‍योतिष विज्ञान है , तो आनेवाले दिनों में मेरे पाठकों के समक्ष स्‍वत: सिद्ध हो जाएगा, चाहे इसकी चर्चा शीर्षक में करूं या नहीं , इतना तो मुझे विश्‍वास है।

कल के लेख में मैने समझाया था कि सबों की नजर अपने को स्थिर मानकर ही परिस्थितियों का अवलोकन करती है। इसलिए हमलोग असमान का अवलोकण पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए करते हैं , इसलिए ज्‍योतिष के इस महत्‍वपूर्ण आधार को गलत साबित करना सही नहीं है। बात अवलोकन तक तो ठीक मानी जा सकती है , पर हमारे अवलोकण से उन राशियों या ग्रहों नक्षत्रों का पृथ्‍वी के जड चेतन पर प्रभाव भी पड जाए , यह तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण वालों को तर्कसम्‍मत नहीं लगता। और ज्‍योतिष  तो पृथ्‍वी के सापेक्ष ही सभी राशियों और ग्रहों  के स्‍थान परिवर्तन की चर्चा करता है और उसके हमपर प्रभाव पर बल देता है। जाहिर है , अधिकांश पाठक इस बात को भी स्‍वीकार नहीं कर पाते।

पर इसके लिए भी मेरे अपने तर्क हैं। हमारे सौरमंडल का एक तारा सूर्य लगभग अचल है , हालांकि इधर के कुछ वर्षों में उसकी गति के बारे में भी जानकारी मिली है , पर यह गति बहुत अधिक नहीं है और वास्‍तव में यह पृथ्‍वी की गति के सापेक्ष ही परिवर्तनशील दिखाई देता है। ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में सूर्य प्रतिदिन एक डिग्री खिसक जाता है , जबकि राशि के हिसाब से प्रतिमाह एक नई राशि में प्रवेश करता है। पृथ्‍वी की वार्षिक गति के सापेक्ष ही पंचांगों में सूर्य की स्थिति में प्रतिदिन परिवर्तन देखा जाता है , जबकि दिन भर के 24 घंटों में  सूर्य की स्थिति में कोणिक परिवर्तन पृथ्‍वी की दैनिक गति के कारण ही होता है। सूर्य की ये दोनो गतियां अवास्‍तविक मानी जा सकती हैं , पर इसके फलस्‍वरूप पृथ्‍वी पर दिन भर के 24 घंटों और वर्षभर के 365 दिनों के सूर्य के अलग अलग प्रभाव को स्‍पष्‍टतया देखा जा सकता है।

पृथ्‍वी की वार्षिक गति के कारण सूर्य की स्थिति में होनेवाले परिवर्तन का प्रभाव हम देख पाते हैं। सूर्य तो 12 महीने के 365 दिनों तक एक ही स्‍थान पर है , पर उसके द्वारा पृथ्‍वी के विभिन्‍न हिस्‍सों में कभी सर्दी तो कभी गर्मी .. इस मौसम परिवर्तन का कारण पृथ्‍वी के कारण उसकी सापेक्षिक गति ही तो है। इसी प्रकार पृथ्‍वी की दैनिक गति के कारण सूर्य की स्थिति में होने वाले परिवर्तन को भी हम सहज ही महसूस कर सकते हैं। सवेरे का सूरज , दोपहर का सूरज और शाम के सूरज की गरमी का अंतर सबको पता है यानि कि अवलोकण के समय सूर्य जहां दिखाई देता है , वैसा ही प्रभाव दिखाता है।

अब चूंकि सूर्य का प्रभाव स्‍पष्‍ट है , इसमें हमारा विश्‍वास हैं , अन्‍य ग्रहों का प्रभाव स्‍पष्‍ट नहीं है , इसलिए इसे अंधविश्‍वास मान लेते है। पर एक सूर्य के उदाहरण से ही पृथ्‍वी के सापेक्ष पूरे आसमान और ग्रहों की स्थिति का प्रभाव भी स्‍पष्‍ट हो जाता है।सापेक्षिक गति के कारण होनेवाले इस एक उदाहरण के बाद ज्‍योतिष के इस आधार में कोई कमी निकालना बेतुकी बात होगी। पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए आसमान को 12 भागों में बांटा जाना और उसमें स्थित ग्रह नक्षत्र के प्रभाव की चर्चा करना पूर्ण तौर पर विज्ञान माना जा सकता है , जिसकी चर्चा लगातार होगी।

Friday, 11 June 2010

ज्‍योतिष में पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए पूरे ब्रह्मांड का अध्‍ययन किया जाता है !!









मेरे द्वारा पत्र पत्रिकाओं में ज्‍योतिष से संबंधित जितने भी लेख छपे , वो सामान्‍य पाठकों के लिए न होकर ज्‍योतिषियों के लिए थे। यहां तक कि मेरी पुस्‍तक भी उन पाठकों के लिए थी , जो पहले से ज्‍योतिष का ज्ञान रखते थे।यही कारण है कि मैं ब्‍लॉग के पाठकों के लिए जनोपयोगी लेख जलखा करती हूं। इधर कुछ वर्षों से ज्‍योतिष में प्रवेश करने के लिए एक पुस्‍तक की मांग बहुत पाठकों द्वारा की जा रही है , क्‍यूंकि इसके बिना वे मेरी पुरानी पुस्‍तक को समझने में समर्थ नहीं हैं। वैसे तो ज्‍योतिष में प्रवेश करने के लिए बाजार में पुस्‍तकों की कमी नहीं , जिसका रेफरेंस मैं अपने पाठकों को देती आ रही हूं , पर अधिक वैज्ञानिक ढंग से पाठकों को ज्‍योतिष की जानकारी दी जा सके , इसलिए मैं इस ब्‍लॉग में खेल खेल में वैज्ञानिक ढंग से ज्‍योतिष की जानकारी देने का प्रयास रही हूं , आप सबों का साथ मिले तो मेरा प्रयास अवश्‍य सफल होगा।

हमारे लिए हमारी यह धरती कितनी भी बडी क्‍यूं न हो , पर इतने बडे ब्रह्मांड में इसकी स्थिति एक विंदू से अधिक नहीं है और इसके चारो ओर फैला है विस्‍तृत आसमान। हमारे ऋषि महर्षियों ने पृथ्‍वी को एक विंदू के रूप में मानते हुए 360 डिग्री में फैले आसमान को 30-30 डिग्री के 12 भागों में बांटा था। इन्‍ही 12 भागों को राशि कहा जाता है , जिनका नामकरण मेष , वृष , मिथुन , कर्क , सिंह , कन्‍या , तुला , वृश्चिक , धनु , मकर , कुंभ और मीन के रूप में किया गया है। यह ज्‍योतिष का एक मुख्‍य आधार है और इन्‍हीं राशियों तथा उनमें अनंत की दूरी तक स्थित ग्रहों के आधार पर ज्‍योतिष के सिद्धांतों की सहायता से भविष्‍यवाणियां की जाती है।

पर हमेशा से ही ज्‍योतिष विरोधी ज्‍योतिष के इस मुख्‍य आधार को ही गलत सिद्ध करने की चेष्‍टा करते हैं। उनका मानना है कि ज्‍योतिष पृथ्‍वी को अचल मानते हुए अपना अध्‍ययन शुरू करता है , जबकि पृथ्‍वी सूर्य के चारो ओर चक्‍कर लगाती है। विरोधी यह मानने की भूल करते हैं कि फलित ज्‍योतिष का विकास उस वक्‍त हुआ , जब लोगों को यह मालूम था कि पृथ्‍वी स्थिर है और सूर्य तथा अन्‍य तारे उसके चारो ओर चक्‍कर लगाती है। हमारे ऋषि मुनियों पर यह इल्‍जाम लगाना बिल्‍कुल गलत है कि उन्‍हे सत्‍य की जानकारी नहीं थी। जब उनके द्वारा विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर विभिन्‍न ग्रहों और खगोलिय स्थिति का एक एक घटी पल निकालना संभव हो चुका है , तब उनके बारे में कोई पूर्वाग्रह पालना उचित नहीं।

इस विषय पर मेरे अपने कुछ तर्क हैं। हमारी अपनी नजर या दृष्टि हमारे शरीर को स्थिर मानकर ही आसपास की परिस्थितियों या दृश्‍यों का अवलोकण करती है, चाहे हमारा शरीर गतिशील ही क्‍यूं न हो। हम सडक पर किसी के साथ चल रहे हों और उसकी गति अधिक हो जाए तो हम अपने को पीछे मानने लगते हैं , यह जानते हुए कि हम पीछे नहीं हैं, अपने घर से काफी आगे बढ चुके हैं। विपरीत स्थिति में हम उसे पीछे मानेंगे , इसका अर्थ यह है कि हम अपने शरीर को स्थिर मानते हुए ही आसपास का जायजा लेते हैं। इसलिए तो भौतिक विज्ञान में भी सापेक्षिक गति की अवधारणा है।

किसी भी वस्‍तु की सापेक्षिक गति हमारी इसी सोंच का परिणाम है। इसी प्रकार हम गाडी में बैठे हों तो न सिर्फ पेड पौघों को गतिशील देख आश्‍चर्यित होते हैं , वरन् यह भी कह बैते हैं कि ‘अमुक शहर , अमुक गांव या अमुक मुहल्‍ला आ गया’, जबकि वो शहर , गांव या मुहल्‍लावहां पहले से होता है। इसी नियम के तहत् जब हमें ब्रह्मांड और आकाश में बिखरे अगणित तारों का अध्‍ययन करना होता है , तो हम पृथ्‍वी को स्थिर और आसमान के सभी राशियों और ग्रहों तारों को गतिशील मान लेते हैं , जो अज्ञानता नहीं मानी जा सकती है।