Friday, 23 July 2010

लग्‍नकुंडली से जानें .. जातक मंगला है या नहीं ??

हमारे समाज में ज्‍योतिष को माननेवालों के मध्‍य विवाह के समय मंगला मंगली की चर्चा खूब होती है। लग्‍नकुंडली से आप समझ सकते हैं कि जातक मंगला है या नहीं। नीचे की जन्‍मकुंडली में वक्र रेखा AB पांच खानों से होकर गुजर रही है । लग्‍नकुंडली में यदि इन पांचों खानों में मंगल की स्थिति हो , तो जातक मंगला होते हैं।
इस जन्‍मकुंडली का जातक मंगला नहीं है .... 
इस जन्‍मकुंडली का जातक मंगला है ....
कुंडली में मंगला और मंगली कितने घातक होते हैं या यह बिल्‍कुल सामान्‍य अवस्‍था है , इसके बारे में जानकारी देते हुए मैं अपने ब्‍लॉग पर एक विस्‍तृत आलेख लिख चुकी हूं , उसे अवश्‍य पढें!!



Wednesday, 21 July 2010

मैने अभी तक राहू और केतु से आपका परिचय क्‍यूं नहीं करवाया ??

कुछ ही दिनों में इस ब्‍लॉग में कई आलेख पोस्‍ट किए जा चुके, लगभग सबमें सभी ग्रहों (जिसमें सूर्य नाम का तारा और चंद्र नाम का उपग्रह भी आ जाता है) की चर्चा हुई , पर किसी में भी राहू और केतु का उल्‍लेख नहीं किया गया।'परंपरागत ज्‍योतिष' बिना राहू और केतु को बैठाए न तो कुंडली निर्माण को पूर्ण मान सकता है और न ही बिना राहू और केतु के भविष्‍य फल कथन ही हो सकता है। पर आप सबों को यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' राहू और केतु को कोई ग्रह नहीं मानता। जब यह पिंड है ही नहीं , तो पृथ्‍वी के जड और चेतन को यह कैसे प्रभावित कर सकता है ??

वास्‍तव में राहू और केतु , जिन्‍हें फलित ज्‍योतिष में ग्रहों के रूप में जाना जाता है , का कोई अस्तित्‍व ही नहीं। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने पर विराट आकाश में सूर्य का एक दीर्घवृत्‍ताकार पथ बन जाता है। पृथ्‍वी के चारो ओर चंद्रमा के परिभ्रमण का एक वृत्‍ताकर पथ है ही। आसमान के खास डिग्री पर सूर्य और चंद्र दोनो के पथ एक दूसरे को काटते नजर आते हैं , जो विंदू उत्‍तर की ओर कटता है , वह राहू तथा जो विंदू दक्षिण की ओर कटता है , वो केतु कहलाता है। दोनो की कोणात्‍मक दूरी 180 डिग्री की होती है। सभी ग्रहों की तरह राहू और केतु की गति आगे बढने की न होकर सदैव पीछे की ओर खिसकने की होती है। राहू और केतु डेढ डेढ वर्ष में एक एक राशि पार करते हुए 18 वर्ष में सभी राशियों को उल्‍टी ओर से घूमते हुए पार कर लेते हैं। आसमान में एक दूसरे के 180 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी में रहने के कारण किसी भी जन्‍मकुंडली में राहू और केतु हमेशा आमने सामने होता है।

फलित ज्‍योतिष में राहू और केतु के इतना भयावह प्रभाव माने जाने की दीर्घकालीन चर्चा का कारण हमलोग सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के प्रभाव को मानते हैं। वास्‍तव में , दोनो ग्रहण के दौरान राहू और केतु नामक ये विशेष विंदू , सूर्य , चंद्र और पृथ्‍वी एक ही सीध में आ जाते हैं। ज्‍योतिष के विकास के बिल्‍कुल आरंभ में शायद ज्‍योतिषियों को यह जानकारी नहीं रही हो कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंड में पडने से ही सूर्य या चंद्रग्रहण होता होता है , इसका कारण ढूंढते वक्‍त ज्‍योतिषियों की नजर इन दोनो विंदूओं पर पडी हो। इन्‍होने पाया होगा कि दोनो ही ग्रहण के दौरान ये विंदू एक सीध में आ जाते हैं , बस ग्रहण का कारण इन्‍हे मान लिया होगा। बाद में इसके कारण ढूंढ लेने पर भी राहू और केतु लोगों के मनोमस्तिष्‍क से नहीं हट सके होंगे।

राहू और केतु आकाशीय पिंड नहीं हैं , इसलिए इन दोनो को संपात विंदू कहा गया है। भौतिक विज्ञान में ऊर्जा के विभिन्‍न प्रकारों में गति , ताप , प्रकाश , विद्यूत , चुंबक और ध्‍वनि का उल्‍लेख मिलता है। इनकी उत्‍पत्ति पदार्थ के बिना संभव नहीं है। इसके साथ ही सभी ऊर्जाएं एक दूसरे में आसानी से रूपांतरित की जा सकती है। हमलोग ग्रह की किस ऊर्जा से प्रभावित होते हैं ,  गुरूत्‍वाकर्षण , गति , किसी प्रकार के प्रकाश , किरण या फिर विद्युत चुंबकीय शक्ति । कह पाना तो अभी बहुत कठिन है , पर इतना अवश्‍य है कि शक्ति के जिस रूप से भी हम प्रभावित होते हों , राहू और केतु इनमें से किसी का उत्‍सर्जन नहीं करते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। इसलिए सूर्य , चंद्रमा एवं अन्‍य ग्रहों की शक्ति की चर्चा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' करता है , पर राहू और केतु की नहीं करता।

Monday, 19 July 2010

एक जन्‍मकुंडली को देखकर हम जातक के बारे में क्‍या क्‍या कह सकते हैं ??

किसी के जन्‍मांग चक्र या जन्‍मकुंडली को देखने से हमें जातक के बारे में बहुत जानकारियां मिल जाती है , ये रही एक व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली ...
  1. जन्‍मुकंडली में सबसे ऊपर मौजूद अंक हमें जातक के लग्‍न की जानकारी देता है , इस कुंडली में 5 अंक सिंह राशि का सूचक है , इसलिए जन्‍म लग्‍न सिंह हुआ , इसका अर्थ यह है कि जातक का जन्‍म उस वक्‍त हुआ , जब आसमान में 120 डिग्री से 150 डिग्री का उदय हो रहा था , जो भचक्र की पांचवी राशि है।
  2. चंद्रमा 9 अंक में मौजूद है , इसलिए चंद्रराशि धनु हुई।
  3. सूर्य 1 अंक में मौजूद है , इसलिए सूर्य राशि मेष हुई।
  4. सूर्य 1 अंक में है , इसका अर्थ यह भी है कि जातक का जन्‍म 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य हुआ है। 
  5. लग्‍न से चौथे खाने में मौजूद सूर्य से हमें यह जानकारी मिल रही है कि जातक का जन्‍म दोपहर बाद लगभग दो तीन बजे हुआ होगा।
  6. सूर्य से पहले चंद्र की स्थिति होने से हमें जानकारी मिल रही है कि जातक का जन्‍म कृष्‍ण पक्ष में हुआ है। 
  7. सूर्य से चार खाने चंद्रमा की स्थिति से मालूम हो रहा है कि जातक का जनम षष्‍ठी के आसपास का है।
  8. अभी शनि कन्‍या राशि में यानि 6 अंक में चल रहा है , जबकि जन्‍मकुंडली में 12 अंक में शनि है। इसका अर्थ यह है कि शनि ने अपना आधा या डेढ या ढाई या साढे तीन चक्र पूरा किया है। इस हिसाब से जातक का जन्‍म लगभग 15 वर्ष या 45 वर्ष या 75 वर्ष पहले हुआ होगा।
  9. अभी बृहस्‍पति मीन राशि में यानि 12 अंक में चल रहा है , जबकि जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति 4 अंक में है। इसका अर्थ यह है कि जातक का जन्‍म लगभग 8 या 20 या 32 या 44 या 56 या 68 या 80 वर्ष पहले हुआ है। 
  10. शनि और बृहस्‍पति दोनो की संभावना 44 के आसपास बनती है , इस हिसाब से जातक की उम्र 44 के आसपास होने का पता चल जाता है।
इसी प्रकार बिना पंचांग के ही अन्‍य जन्‍मकुंडली से भी जातक के बारे में ये दसों जानकारियां प्राप्‍त की जा सकती हैं , इसके लिए सभी पुराने आलेख पढें !!

Friday, 16 July 2010

शनि को एक एक राशि पार करने में ढाई वर्ष लगते हैं !!

सौरमंडल में सबसे अधिक दूरी पर स्थित ग्रह शनि को एक एक राशि पार करने में ढाई ढाई वर्ष लगते हैं और इस तरह वह लगभग 30 वर्षों में सभी राशियों की परिक्रमा कर लेता है। पिछले वर्ष यानि 2009 से शनि कन्‍या राशि में भ्रमण कर रहा है और 2011 के नवंबर में तुला राशि में चला जाएगा। इसी प्रकार लगभग ढाई ढाई वर्ष एक एक राशि में रहते हुए 2038 के  आसपास पुन: कन्‍या राशि में चलेगा। जन्‍मकुंडली में शनि की स्थिति को देखकर जातक के जन्‍म के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। हां , बृहस्‍पति की तरह यहां भी आप कुछ अंदाजा लगा कर आप एक निष्‍कर्ष पर पहुंच सकते हैं।

चूंकि आज शनि कन्‍या राशि में एक वर्ष तक चल चुका है , यदि किसी की जन्‍मकुंडली में 6 अंक में ही शनि है तो आप समझ सकते हैं कि जातक 30 , 60 या 90 के आसपास की उम्र का है और क्रमश: एक एक राशि को पार करता हुआ पूरा चक्र पार कर यहां तक आ चुका है। इसी प्रकार यदि शनि 5 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 3 , 33 ,63 या 93 वर्ष के लगभग पहले जन्‍म लिया है। इसी प्रकार शनि 4 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 6 , 36 , 66 , 96 वर्ष पहले जन्‍म लिया था। किसी के जन्‍म वर्ष को जानने के लिए शनि के अलावे उसकी जन्‍मकुंडली के बृहस्‍पति का भी सहारा लिया जा सकता है।

महीने की जानकारी में सूर्य की स्थिति मदद कर ही देती है और जन्‍मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति से आप तिथि तक पहुंच सकते हैं। इस क्षेत्र में जैसे जैसे अभ्‍यास बढता जाता है , सिर्फ जन्‍मकुंडली देखकर जातक के जन्‍म के बारे में सबकुछ जानने समझने में मदद मिलती जाती है। और इस तरह जन्‍मकुंडली नाम के इस छोटे से चक्र से न सिर्फ बालक की उम्र का पता चलता है , वरन् उसके जन्‍म के समय की आकाशीय स्थिति  , उसके जन्‍म का महीना, तिथि , प्रहर सबकुछ की जानकारी हमें मिल जाती है , ज्‍योतिष जैसे विषय में प्राचीनकाल की इतनी अच्‍छी व्‍यवस्‍था को देखकर आज भी मुझे बडी हैरत होती है।

Monday, 12 July 2010

बृहस्‍पति को एक एक राशि पार करने में एक वर्ष लगते हैं !!

जैसा कि पुराने लेखों से स्‍पष्‍ट हो चुका है कि पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से आसमान में पूरब से पश्चिम की ओर घूमती हुई जो पट्टी दिखती है , उस 360 डिग्री के 12 भाग कर देने से हमें 30-30 डिग्री की 12 राशियां मिलती हैं। सूर्य एक एक महीने में उसकी परिक्रमा करता है और उसी के साथ साथ बुध और शुक्र भी सभी राशियों को पार करने में पूरे साल लगा देते हैं। चंद्रमा ढाई ढाई दिनों में एक राशि को पार करते हुए पूरे चंद्रमास के दौरान सभी राशियों को पार कर जाता है। मंगल भी यदि वक्री गति में न हो , तो वर्षभर में सभी राशियों को पार कर लेता है।

सौरमंडल में अधिक दूरी पर स्थित ग्रह बृहस्‍पति को एक एक राशि पार करने में एक एक वर्ष लगते हैं और इस तरह वह 12 वर्षों में सभी राशियों की परिक्रमा कर लेता है। अभी यानि मई 2010 से बृहस्‍पति मीन राशि में भ्रमण कर रहा है और 2011 के मई में मेष राशि में चला जाएगा। इसी प्रकार लगभग एक एक वर्ष एक एक राशि में रहते हुए 2022 में पुन: मीन राशि में चलेगा।

जिस तरह किसी व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली में स्थित सूर्य को देखकर जातक के जन्‍म के महीने और जन्‍म के प्रहर का अनुमान तथा सूर्य से चंद्रमा की दूरी को देखने से चंद्रमा के आकार का अनुमान लगाया जा सकता है, , वैसा जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति की स्थिति को देखकर जातक के जन्‍म के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। हां , आप कुछ अंदाजा तो लगा ही सकते हैं। बाकी की कमी शनि की स्थिति को देखकर पूरी की जा सकती है। और इस तरह आप एक निष्‍कर्ष पर पहुंच सकते हैं।

चूंकि आज बृहस्‍पति मीन राशि में यानि 12 अंक में चल रहा है , यदि किसी की जन्‍मकुंडली में 12 अंक में बृहस्‍पति है तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 12 , 24 , 36 , 48 , 60 , 72 या 84 वर्ष पहले जन्‍म लिया है और क्रमश: एक एक राशि को पार करता हुआ पूरा चक्र पार कर यहां तक आ चुका है। इसी प्रकार यदि बृहस्‍पति 11 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 13 , 25 , 37 , 49 , 61 , 73 या 85 वर्ष पहले जन्‍म लिया है। इसी प्रकार बृहस्‍पति 10 अंक में हो , तो आप समझ सकते हैं कि जातक ने 14 , 26 , 38 , 50 , 62, 74 , या 86 वर्ष की उम्र का है। इसी प्रकार जन्‍मकुंडली की बृहस्‍पति और आज की बृहस्‍पति की स्थिति को देखते हुए जातक के उम्र का अंदाजा लगा सकते हैं।

Friday, 9 July 2010

जन्‍मकुंडली में भी अधिकांश समय बुध और शुक्र सूर्य के साथ साथ ही होते हैं !!

पिछले आलेखों में आपको जानकारी मिली थी कि पृथ्‍वी को स्थिर रखने से पूरे आसमान की 360 डिग्री को 12 भागों में बांटकर 12 राशियां बनायी गयी हैं। सूर्य एक एक राशि में एक महीने ठहरते हुए पूरे वर्ष में कुल 12 राशियों का चक्‍कर और चंद्रमा एक एक राशि में ढाई दिनों तक रहते हुए कुल 12 राशियों का चक्‍कर एक माह में लगाता है।

इसी प्रकार अन्‍य ग्रह भी नियमित तौर पर पूरे भचक्र का चक्‍कर लगाते हैं। चूंकि सौरमंडल में मंगल , बृहस्‍पति और शनि जैसे ग्रहों की स्थिति पृथ्‍वी के बाद होते हैं , इसलिए इनका सूर्य की गति से कोई संबंध नहीं होता , यही कारण है कि ये तीनो ग्रह आसमान में कहीं पर भी हो सकते हैं , यही कारण है कि जन्‍मकुंडली में ये 12 खाने में कहीं भी छितराये हो सकते हैं।

पर सौरमंडल में बुध और शुक्र .. ये दो ग्रह ऐसे हैं , जो सूर्य और पृथ्‍वी के मध्‍य स्थित होकर सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इस कारण पृथ्‍वी को स्थिर रखते हुए जब सभी ग्रहों की गति का अध्‍ययन होता है , तो वे अधिकांश समय सूर्य के साथ साथ ही देखे जाते हैं। सूर्य से अधिक निकट होने के कारण बुध सूर्य से अधिकतम 27 डिग्री की दूरी पर हो सकता है , जबकि शुक्र सूर्य से अधिकतम 47 डिग्री की दूरी पर होता है।

यही कारण है कि जन्‍मकुंडली में भी अधिकांश समय बुध और शुक्र सूर्य के साथ साथ ही होते हैं। किसी भी जन्‍मकुंडली में बुध सूर्य के साथ या उससे अगले खाने में हो सकता है , जबकि शुक्र सूर्य के साथ या उससे अधिकतम दो खाने आगे तक रह सकता है। इस प्रकार जिस महीने में सूर्य जिस राशि में होता है , बुध और शुक्र भी उसी राशि के आसपास होते हैं।

Sunday, 4 July 2010

हिंदी कैलेण्‍डर के माह के नाम नक्षत्रों के नाम पर होते हैं !!

आप सबों को यह मालूम होगा कि पृथ्‍वी की वार्षिक गति के हिसाब से अंग्रेजी कैलेण्‍डर में 365 दिनों का एक सौर वर्ष होता है । पुन: पृथ्‍वी अपनी कक्षा में घूमती हुई उसी स्‍थान पर आ जाती है , जहां से दूसरा वर्ष शुरू हो जाता है। इस 365 दिन को सामान्‍य ढंग से 12 भागों में बांटकर 12 महीने तैयार कर दिए गए हैं। पर हिंदी कैलेण्‍डर अंग्रेजी कैलेण्‍डर से पूर्णतया भिन्‍न है , हमारे परंपरागत कैलेण्‍डर में सौर वर्ष और चंद्रवर्ष दोनो की गणना अलग ढंग से की जाती है। सौरवर्ष की गणना उस दिन से आरंभ की जाती है ,जिस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। एक एक महीने में सूर्य की दूसरी राशि में संक्रांति के साथ साथ माह बदलता जाता है और 365 दिनों में एक वर्ष पूरा हो जाता है।

पर इसके अलावे पंचांग में एक और कैलेण्‍डर होता है , इसका आधार पृथ्‍वी की वार्षिक गति नहीं होती है। हिंदी कैलेण्‍डर में वर्ष की गणना न कर पहले महीने की गणना शुरू की जाती है। हिंदी के कैलेण्‍डर में पूर्णिमा के दूसरे दिन से लेकर अगले माह की पूर्णिमा तक एक माह पूरा होता है। इस प्रकार 12 माह होने पर एक वर्ष पूरा होता मान लिया जाता है। हिंदी महीनों के नाम हैं .. चैत्र , बैशाख , ज्‍येष्‍ठ , आषाढ , श्रावण , भाद्रपद , आश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ , फाल्‍गुन। एक पूर्णिमा से दूसरे पूर्णिमा तक का समय लगभग 29 दिन कुछ घंटों का होता है , इसी कारण हिंदी वर्ष 354 दिनों में ही समाप्‍त हो जाता है और नए वर्ष की शुरूआत हो जाती है। इसलिए तीन वर्ष बाद सौरवर्ष की तुलना में समय एक माह पीछे चलने लगता है। इसके समायोजन के लिए पंचांगों में हर तीसरे वर्ष एक अधिमास की व्‍यवस्‍था रखी गयी है।

वैसे तो सामान्‍य तौर पर 15 मार्च के आसपास से हिंदी वर्ष की शुरूआत होती है , जिस समय सूर्य मीन राशि में होता है , इसलिए चैत्र माह का अमावस्‍या मीन राशि में और पूर्णिमा कन्‍या राशि में होना चाहिए। इसी प्रकार बैशाख माह का अमावस्‍या मेष राशि में और पूर्णिमा तुला राशि में होना चाहिए , पुन: क्रम से ज्‍येष्‍ठ माह का अमावस्‍या वृष राशि में और पूर्णिमा वृश्चिक राशि में , आषाढ मास का अमावस्‍या मिथुन राशि में और पूर्णिमा धनु राशि में , श्रावण माह का अमावस्‍या कर्क राशि में और पूर्णिमा मकर राशि में , भाद्रपद का अमावस्‍या सिंह और पूर्णिमा कुंभ राशि में , आश्विन का अमावस्‍या कन्‍या और पूर्णिमा मीन राशि में , कार्तिक का अमावस्‍या तुला और पूर्णिमा मेष राशि में , मार्गशीर्ष का अमावस्‍या वृश्चिक और पूर्णिमा वृष राशि में , पौष का अमावस्‍या धनु और पूर्णिमा मिथुन राशि में , माघ का अमावस्‍या मकर और पूर्णिमा कर्क राशि में तथा फाल्‍गुन का अमावस्‍या कुंभ और पूर्णिमा सिंह राशि में होना चाहिए।

पर सौरवर्ष की तुलना में चंद्रवर्ष के पीछे खिसकते जाने से हिंदी कैलेण्‍डर का माह इस तरह निश्चित नहीं रह पाता है। दरअसल हिंदी माह की गणना नक्षत्रों के हिसाब से की जाती है , जिस महीने पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में पडे , वहां चैत्र का महीना , जिस महीने पूर्णिमा बिशाखा नक्षत्र में पडे , बैशाख का महीना , जिस महीने पूर्णिमा ज्‍येष्‍ठा नक्षत्र में पडे , ज्‍येष्‍ठ महीना , जिस महीने पूर्णिमा पूर्वाषाढा नक्षत्र में पडे , आषाढ का महीना , जिस महीने पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र में पडे , श्रावण का महीना , जिस महीने पूर्वभा्रद्रपद नक्षत्र में पडे , भाद्रपद का महीना , जिस महीने पूर्णिमा अश्विनी नक्षत्र में पडे , उस महीने आश्विन का महीना , जिस महीने पूर्णिमा कृतिका नक्षत्र में पडे , कार्तिक का महीना , जिस महीने पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र में पडे , माघ का महीना , जिस महीने पूर्णिमा पुष्‍य नक्षत्र में पडे , पोष का महीना तथा जिस महीने पूर्णिमा फाल्‍गुनी नक्षत्र में पडे , उसे फाल्‍गुन का महीना माना जाता है।