Saturday, 28 August 2010

गोचर क्‍या होता है ??

ज्‍योतिष में रूचि रखने वाले भी बहुत लोग गोचर का अर्थ नहीं जानते हैं। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रहों की गति ही गोचर कहलाती है। आकाश में वर्तमान में कौन सा ग्रह किस राशि और नक्षत्र में चल रहा है, यही ग्रहों का गोचर है , जिसे हम पंचांग के माध्‍यम से जान पाते हैं। भले ही हम जीवनभर की परिस्थितियां अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्‍त करते हों , पर गोचर का विचार फलित करते समय महत्‍वपूर्ण माना जाता है , क्‍यूंकि अस्‍थायी समस्‍याओं को जन्‍म देने में इसकी बडी भूमिका होती है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से किसी राशि या नक्षत्र में कोई ग्रह शुभ या अशुभ नहीं होते , हां उनके प्रभाव में थोडी बहुत कमी अवश्‍य आ सकती है। अलग अलग व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली के हिसाब से एक ही राशि में स्थि‍त शनि किसी को अच्‍छे तो किसी को बुरे फल से संयुक्‍त कर सकता है।

इतने लंबे जीवन में हम पाते हैं कि वर्षभर के 365 दिन ही क्‍या , दिनभर के 24 घंटे एक समान नहीं होते। एक पल में हम मौज और मस्‍ती कर रहे होते हैं , तो दूसरे ही पल तमाम जिम्‍मेदारियां मुंह बाये खडी होती है , तीसरे ही पल किसी न किसी प्रकार का तनाव हमारे जीवन में आ जाता है। पर्याप्‍त रिसर्च के अभाव में भले ही एक एक पल के इस सुखमय और दुखमय समय के बारे में पहले से जानना कठिन हो , पर ये माहौल गोचर के ग्रहों की स्थिति से ही जन्‍म लेती है। शनि के कारण आप ढाई वर्षों तक किसी समस्‍या से निरंतर जूझ सकते हैं , जबकि बृहस्‍पति की स्थिति से एक वर्ष तक , एक छोटा सा चंद्रमा हमें ढाई दिनों तक परेशान कर सकता है तथा आसमान की अन्‍य स्थिति पर हम ध्‍यान दें तो एक एक घटी और पल के सुख दुख का अनुमान लगाया जा सकता है।

इस तरह भले ही जीवन भर प्राप्‍त सुख दुख और दीर्घकालीन उतार चढाव हम अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्त करते हों, परछोटी छोटी अवधि में आनेवाली बाधाएं गोचर के ग्रहों पर आधारित होती हैं और इसलिए भविष्‍य कथन में इनका ध्‍यान रखना आवश्‍यक होता है। जैसे जन्‍मकालीन ग्रहों की स्थिति के आधार पर किसी युवक या युवति के वैवाहिक संदर्भों में कोई कठिनाई न हो , तो विवाह मनोनुकूल स्‍थान में होने की पूरी संभावना रहेगी , पर कभी कभी विवाह में खासी समस्‍याएं आ जाती हैं। या तो विवाह में देर होती है या फिर कोई दूसरी समस्‍या। ऐसा इसलिए होता है क्‍यूंकि जब वो या उनके अभिभावक विवाह के लिए गंभीर हुए , वैवाहिक मामलों के लिए जिम्‍मेदार कोई ग्रह गोचर में अच्‍छी स्थिति में न चल रहा होता है। गोचर के ग्रह कभी कभी छह सात वर्षों तक किसी प्रकार की बाधा उपस्थित करने में जिम्‍मेदार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में जन्‍मकालीन ग्रहों के आधार पर हमारे द्वारा बनाया जानेवाला जातक का जीवनग्राफ भी काम नहीं करते देखा जाता है। यही कारण है कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' गोचर के ग्रहों को बहुत महत्‍व देता है।

Wednesday, 25 August 2010

जन्‍मकुंडली में सर्वाधिक महत्‍व लग्‍न का होता है !!

पुराने लेखों में मैने बताया ही है कि जन्‍मकुंडली में सर्वाधिक महत्‍व लग्‍न यानि पूर्वी क्षितिज में उदित होनेवाली राशि का होता है । लग्‍न के सापेक्ष सभी ग्रहों की स्थिति ही एक जातक की परिस्थितियां भिन्‍न होती हैं और उनके के सोंचने का ढंग भी अलग होता है । लग्‍न की जानकारी के लिए हमारे पंचांगों में एक चार्ट होता है , जिसमें बच्‍चे के जन्‍म तिथि , जन्‍मसमय और जन्‍मस्‍थान के आधार पर उसके लग्‍न की जानकारी हो जाती है। आज तो किसी जातक का लग्‍न निकालने के लिए बहुत सुविधा हो गयी है। इंटरनेट में भी आप किसी बच्‍चे के लग्‍न की जानकारी के लिए कई लिंकों पर जा सकते हैं , यहां और यहां । जन्‍म के शहर के लांगिच्‍यूड और लैटिच्‍यूड के लिए आप इस लिंक पर भी जा सकते हैं।

पूर्व के लेखों में बताया गया है कि सूर्य प्रत्‍येक राशि में एक एक महीने महीने भ्रमण करता हुआ सौरवर्ष के अंत में पुन: उसी स्‍थान पर आ जाता है। इस सूर्य और जन्‍म समय के आधार पर हम मोटा मोटी तौर पर किसी बच्‍चे के जन्‍म लग्‍न का अनुमान भी कर सकते हैं। 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य सूर्य मेष राशि में होता है , इसलिए उस समय सूर्योदय के आसपास जन्‍म लेने वाला मेष लग्‍न में ही होगा , क्रमश: दो दो घंटे बाद लग्‍न परिवर्तित होता जाता है , इसलिए लगभग दो दो घंटे बाद जन्‍मलेने वाले बच्‍चे अगले लग्‍न में आते चले जाएंगे। इस माह मध्‍य दोपहर में जन्‍म लेनेवाला बच्‍चा कर्क लग्‍न में तथा सूर्यास्‍त के समय जन्‍म लेनेवाला बच्‍चे का जन्‍म मेष के ठीक सामने वाली राशि में यानि तुला लग्‍न में होगा। इसी प्रकार मध्‍य रात्रि में जन्‍म लेनेवाला बच्‍चे का लग्‍न मकर होगा।

इसी प्रकार सूर्य के वृष  राशि में होने के वक्‍त यानि 15 मई से 15 जून के मध्‍य सूर्योदय के आसपास जन्‍म लेनेवाला बालक वृष लग्‍न में जन्‍म लेगा , दो दो घंटे बाद जन्‍मलेनेवालों के लग्‍न आगे बढते चले जाएंगे और दो पहर के मध्‍य जन्‍म लेनेवाला सिंह लग्‍न में , सूर्यास्‍त के वक्‍त जन्‍म लेनेवाला वृश्चिक में तथा मध्‍य रात्रि को ज्न्‍म लेनेवाले का जन्‍म कुंभ लग्‍न में होगा। इसी प्रकार आगे के महीनों में सूर्य के राशि परिवर्तन के बाद यह चक्र बढता चला जाएगा। इस आधार पर आप मोटा मोटी तौर पर जातक के लग्‍न की जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं। मैने बारहो महीनों के लग्‍न चार्ट को एक छोटे से ग्राफ पेपर में भी समेटा है , उसके आधार पर भी आप किसी भी व्‍यक्ति की जन्‍म तिथि , जन्‍मसमय और स्‍थानीय समय के आधार पर जातक के लग्‍न का पता कर सकते हैं।

Monday, 23 August 2010

जन्‍मकालीन ग्रहों के अलावे गोचर में चलनेवाले ग्रहों की शक्ति कोभी देखा जाना चाहिए !!

पिछले दो आलेखों में मैने लिखा कि किसी भी जन्‍मकुंडली से जातक के जीवन के विभिन्‍न पक्षों के बारे में स्‍थायी रूप से जानने के लिए उस भाव के भावेश तथा उसमें स्थित ग्रहों का ध्‍यान रखना आवश्‍यक होता है। इस हिसाब से संलग्‍न जन्‍मकुंडली में जातक के स्‍वास्‍थ्‍य के मामलों को देखने के लिए हमें सूर्य की स्थिति और शक्ति पर ध्‍यान देना होगा। इसी प्रकार धन विषयक मामलों को जानने के लिए बुध ग्रह की शक्ति और स्थिति को , भाई बंधु की स्थिति को जानने के लिए शुक्र की स्थिति और शक्ति की जानकारीआवश्‍यक होगी।इसी प्रकार हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति का आकलन करने के लिए मंगल की स्थिति भी महत्‍वपूर्ण होगी। 


अब चूंकि बुद्धि ज्ञान और संतान के भाव का स्‍वामी बृहस्‍पति है , जबकि वहां चंद्रमा की भी स्थिति है , इसलिए बुद्धि और संतान की स्थिति को जानने के लिए बृहस्‍पति के साथ साथ चंद्र की स्थिति और शक्ति को जानना अनिवार्य है। इसी प्रकार अष्‍टम भाव यानि जीवनशैली की जानकारी के लिए बृहस्‍पति के साथ ही साथ शनि की शक्ति और स्थिति की जानकारी आवश्‍यक होगी। घर गृहस्‍थी और झंझट की स्थिति को समझने के लिए भी शनि की शक्ति और स्थिति को देखना भाग्‍य को जानने के लिए मंगल के साथ साथ सूर्य और बुध की शक्ति को समझना आवश्‍यक है ।


इसी प्रकार पिता या सामाजिक राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए शुक्र तथा लाभ से संबंधित मामलों के लिए बुध की शक्ति और स्थिति को देखना आवश्‍यक होगा। खर्च और बाहरी संदर्भों की जानकारी के लिए चंद्र के साथ ही साथ बृहस्‍पति की भी स्थिति और शक्ति की जानकारी आवश्‍यक होगी। जन्‍मकालीन ग्रहों की शक्ति और स्थिति से संदर्भों के जीवनभर की स्थिति का पता चलेगा , जबकि अस्‍थायी रूप से आनेवाली समस्‍याओं के लिए गोचर के चाल पर भी ध्‍यान रखना आवश्‍यक है।



'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार जन्‍मकालीन ग्रहों के अलावे गोचर के ग्रह भी जातक के विभिन्‍न संदर्भों को प्रभावित करते हैं , इसलिए पंचांग के अनुसार ग्रहों की हर समय की स्थिति को जानना एक ज्‍योतिषी के लिए अनिवार्य है , गोचर में विभिन्‍न राशियों में स्थित विभिन्‍न ग्रह जिस भाव के स्‍वामी होते हैं  और जिस भाव में स्थित होते हैं , उससे संबंधित अच्‍छे या बुरे फल प्रदान करते हैं , इसके लिए गोचर में चलनेवाले ग्रहों की शक्ति कोभी देखा जाना चाहिए।

Saturday, 21 August 2010

विभिन्‍न लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों के लिए भिन्‍न भिन्‍न ग्रह जिम्‍मेदार होते हैं !!

पिछले पोस्‍ट में आपने देखा कि  पर यदि तुला लग्‍न की सारी कुंडलियों की बात की जाए , तो इनमें निम्‍न ग्रहों के सहारे निम्‍न पक्षों की भविष्‍यवाणी की जा सकती है .....
चंद्र के सहारे पिता व सामाजिक स्थिति,
सूर्य के सहारे लाभ और लक्ष्‍य,
बुध के सहारे भाग्‍य और खर्च,
शुक्र के सहारे शरीर और जीवनशैली ,
मंगल के सहारे धन और घर गृहस्‍थी,
बृहस्‍पति के सहारे भाई बंधु और झंझट ,
शनि के सहारे संपत्ति , बुद्धि और संतान ।
इसी आधार पर  सभी लग्‍नवालों के अलग अलग पक्ष को देखने के लिए अलग अलग ग्रहों की शक्ति पर नजर रखनी पडती है ।

मेष लग्‍नवालों की कुंडली में चंद्र से माता , हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , बुध से भाई बंधु और झंझट से जूझने की शक्ति , मंगल से शरीर, व्‍यक्तित्‍व और जीवनशैली , शुक्र से धन और घर गृहस्‍थी , सूर्य से बुद्धि ज्ञान और संतान , बृहस्‍पति से भाग्‍य , खर्च और बाहरी संदर्भ तथा शनि से पिता , पद प्रतिष्‍ठा और लाभ देखा जाता है।

इसी प्रकार वृष लग्‍नवालों की कुंडली में चंद्र से भाई बंधु , बुध से धन और बुद्धि , ज्ञान , मंगल से घर गृहस्‍थी और खर्च , शुक्र से शरीर व्‍यक्तित्‍व और संघर्ष क्षमता , सूर्य से हर प्रकार कर संपत्ति , बृहस्‍पति से जीवनशैली और लाभ तथा शनि से पिता , पद प्रतिष्‍ठा और भाग्‍य की स्थिति देखी जाती है।

मिथुन लग्‍नवालों की कुंडली में चंद्र से धन की स्थिति , बुध से शरीर , माता और हर प्रकार की संपत्ति , मंगल से लाभ और रोग , ऋण , शत्रु जैसे झंझट , शुक्र से घर गृहस्‍थी , खर्च और बाहरी संदर्भ , सूर्य से भाई बंधु , बृहस्‍पति से पिता , पद प्रतिष्‍ठा का वातावरण और घर गृहस्‍थी तथा शनि से भाग्‍य और जीवन शैली से संबंधित मामले देखे जाते हैं।

कर्क लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से स्‍वास्‍थ्‍य , बुध से भाई बंधु और खर्च , मंगल से पिता , पद प्रतिष्‍ठा , बुद्धि ज्ञान और संतान , शुक्र से हर प्रकार की संपत्ति और लाभ , सूर्य से धन , बृहस्‍पति से हर प्रकार के झंझट और भाग्‍य तथा शनि से घर गृहस्‍थी और जीवनशैली की स्‍िथति देखी जाती है।

सिंह लग्‍नवाले की जन्‍मकुंडली में चंद्र से खर्च और बाहरी संदर्भों , बुध से धन और लाभ, मंगल से हर प्रकार की संपत्ति और भाग्‍य की स्थिति , शुक्र से भाई बंधु और पद प्रतिष्‍ठा , सूर्य से स्‍वास्‍थ्‍य , बृहस्‍पति से संतान , बुद्धि ज्ञान और जीवन शैली तथा शनि से घर गृहस्‍थी का वातावरण देखा जाता है।

कन्‍या लग्‍न वालें की जन्‍मकुंडली में चंद्र से लाभ , बुध से शरीर , व्‍यक्तित्‍व , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा , मंगल से भाई बंधु और जीवनशैली , शुक्र से धन और भाग्‍य , सूर्य से खर्च और बाहरी संदर्भ , बृहस्‍पति से माता , हर प्रकार की संपत्ति और घर गृहस्‍थी तथा शनि से बुद्धिज्ञान , संतान और प्रभाव की स्थिति देखी जाती है।

वृश्चिक लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से भाग्‍य , बुध से लाभ और जीवनशैली , मंगल से स्‍वास्‍थ्‍य और प्रभाव , शुक्र से घर गृहस्‍थी और जीवनशैली , सूर्य से पद प्रतिष्‍ठा का वातावरण , बृहस्‍पति से धन , बुद्धि और संतान पक्ष तथा शनि से भाई बंधु , माता और हर प्रकार की संपत्ति देखे जाते हैं।

धनु लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडलीमें चंद्र से जीवनशैली , बुध से घर गृहस्‍थी , पिता और प्रतिष्‍ठा का वातावरण , मंगल से बुद्धि ज्ञान , संतान , खर्च और बाह्य संदर्भ , शुक्र से लाभ और झंझट , सूर्य से भाग्‍य , बृहस्‍पति से स्‍वास्‍थ्‍य , माता , हर प्रकार की संपत्ति तथा शनि से भाई बंधु और धन की स्थिति देखी जाती है।

 मकर लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से घर गृहस्‍थी , बुध से भाग्‍य और प्रभाव , मंगल से हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति और लाभ , शुक्र से बंद्धि ज्ञान , संतान , पिता और पद प्रतिष्‍ठा , सूर्य से जीवनशैली , बृहस्‍पति से भाई बंधु , खर्च और बाह्य संदर्भ तथा शनि से स्‍वास्‍थ्‍य और धन की स्थि‍ति देखी जाती है।

कुंभ लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्र से झंझट , बुध से बुद्धि , ज्ञान , संतान , जीवनशैली ,  मंगल से भाई बंधु ,‍िपता और पद प्रतिष्‍ठा का वातवरण , शुक्र से भाग्‍य और हर प्रकार की छोटी बडी अचल संपत्ति , सूर्य से घर गृहस्‍थी का वातावरण , बृहस्‍पति से धन और लाभ की स्थिति तथा शनि से स्‍वास्‍थ्‍य और खर्च की स्थिति देखी जाती है।

इसी प्रकार मीन लग्‍न की जन्‍मकुंडली में चंद्र से बुद्धि ज्ञान और संतान की स्थिति , बुध से माता , हर प्रकार की संपत्ति और घर गृहस्‍थी की स्थिति , मंगल से धन और भाग्‍य की स्थिति , शुक्र से भाई बंधु और जीवन की स्थिति , सूर्य से हर प्रकार के झंझट , बृहस्‍पति से स्‍वास्‍थ्‍य , पिता और पद प्रतिष्‍ठा की स्थिति तथा शनि से लाभ और खर्च की स्थिति का आकलन किया जाता है।

विभिन्‍न संदर्भों की परिस्थितियों के निर्माण में उस भाव के स्‍वामी , जिसकी चर्चा ऊपर हुई है , की मुख्‍य भूमिका होने के अलावे उस भाव में मौजूद ग्रहों की भी आंशिक भूमिका होती है , इसलिए उनकी शक्ति का भी अध्‍ययन किया जाना आवश्‍यक होता है। इसलिए जन्‍मकुंडली के किसी भाव को समझने के लिए उस भाव के स्‍वामी और वहां स्थित ग्रहों पर नजर रखनी चाहिए , बाकी ग्रहों की भूमिका उसके बाद ही होती है।

Saturday, 14 August 2010

जन्‍मकुंडली से जातक के प्रत्‍येक पक्ष की जानकारी हमें कैसे प्राप्‍त हो सकती है ??

पिछले आलेख में मैने बताया था कि विभिन्‍न भावों में लिखे अंक के स्‍वामी ग्रह जातक के उस पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करने वाले होते हैं। जातक की जन्‍मकुंडली के हिसाब से विभिन्‍न पक्षों का आकलन करने के लिए हमें उस भाव के स्‍वामी ग्रह के अतिरिक्‍त उसमें स्थित ग्रहों को भी ध्‍यान में रखना पडता है। अब नीचे दिए गए चित्र को देखिए ....



  उपरोक्‍त जन्‍मकुंडली तुला लग्‍न की है , पहले भाव में 7 अंकित है , इसका अर्थ है कि जातक के शरीर और व्‍यक्तित्‍व से संबंधित मामलों की जानकारी के लिए 7 अंक यानि तुला राशि के स्‍वामी यानि शुक्र की शक्ति की जानकारी आवश्‍यक है।
दूसरे भाव में 8 अंकित है , इसका अर्थ यह है कि जातक के धन विषयक मामलों को जानने के लिए 8 अंक यानि वृश्चिक राशि के स्‍वामी यानि मंगल की शक्ति जानकारी आवश्‍यक है।
तीसरे भाव में 9 अंकित है  जिसका अर्थ यह है कि जातक के भाईबंधु विषयक मामलों को जानने के लिए 9 अंक यानि धनुराशि के स्‍वामी यानि बृहस्‍पति की शक्ति का ज्ञान आवश्‍यक है।
चतुर्थ भाव में 10 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के संपत्ति विषयक मामलों को जानने के लिए 10 अंक यानि मकर राशि के स्‍वामी शनि की शक्ति का ज्ञान आवश्‍यक है।
पंचम भाव में 11 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के बुद्धि और संतान विषयक मामलों को प्रभावित करनेवाला ग्रह 11 अंक यानि कुंभ राशि का स्‍वामी शनि है और शनि की शक्ति से इसका आकलन किया जा सकता है।
षष्‍ठ भाव में 12 अंकित होने का अर्थ है कि जातक के झंझट विषयक मामलों को जानने के लिए 12 अंक यानि मीन राशि के स्‍वामी बृहस्‍पति की शक्ति को जानना आवश्‍यक है।
सप्‍तम भाव में 1 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक की घर गृहस्‍थी विषयक मामलों को जानने के लिए 1 अंक यानि मेष राशि के स्‍वामी मंगल की शक्ति को ध्‍यान दिया जाए।
अष्‍टम भाव में 2 अंकित होने का अर्थ है कि उसकी जीवनशैली को देखने के लिए 2 अंक यानि वृष के स्‍वामी शुक्र की शक्ति पर भी गौर किया जाए।
नवम् भाव में 3 अंकित होने का अर्थ है कि जातक के भाग्‍य विषयक मामलों की जानकारी के लिए 3 अंक यानि मिथुन राशि के स्‍वामी बुध की शक्ति की जानकारी आवश्‍यक है।
दशम भाव में 4 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के पिता या सामाजिक मामलों को जानने के लिए 4 अंक यानि कर्क राशि  के स्‍वामी चंद्र की शक्ति को जानना आवश्‍यक है।
एकादश भाव में 5 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के लाभ और लक्ष्‍य को समझने के लिए 5 अंक यानि सिंह राशि के स्‍वामी सूर्य की स्थिति को जानना आवश्‍यक है।
द्वादश भाव में 6 अंकित होने का अर्थ यह है कि जातक के खर्च या बाहरी संदर्भों को देखने के लिए 6 अंक यानि कन्‍या राशि के स्‍वामी बुध की शक्ति को समझना आवश्‍यक है।

जातक के जीवन के सभी पक्षों को देखने के लिए संबंधित उपरोक्‍त ग्रहों के अलावे इस जन्‍मकुंडली में अन्‍य बातों का भी ध्‍यान रखना पडेगा। चूंकि पहले भाव में मंगल , दूसरे में बुध , तीसरे में सूर्य , चौथे में शुक्र , पांचवे शनि , आठवें बृहस्‍पति तथा नवें में चंद्र की स्थिति है। इसलिए इस जन्‍मकुंडली में शरीर की स्थिति को समझने में मंगल का , धन की स्थिति को समझने में बुध का , भाई बंधु की स्थिति को समझने में सूर्य का , संपत्ति की स्थिति को समझने में शुक्र का , जीवनशैली की स्थिति को समझने में बृहस्‍पति का तथा भाग्‍य की स्थिति को समझने में च्रद का भी आंशिक महत्‍व होगा । पर यदि तुला लग्‍न की सारी कुंडलियों की बात की जाए , तो इनमें निम्‍न ग्रहों के सहारे निम्‍न पक्षों की भविष्‍यवाणी की जा सकती है .....
चंद्र के सहारे पिता व सामाजिक स्थिति,
सूर्य के सहारे लाभ और लक्ष्‍य,
बुध के सहारे भाग्‍य और खर्च,
शुक्र के सहारे शरीर और जीवनशैली ,
मंगल के सहारे धन और घर गृहस्‍थी,
बृहस्‍पति के सहारे भाई बंधु और झंझट ,
शनि के सहारे संपत्ति , बुद्धि और संतान !!

Sunday, 8 August 2010

किसी जन्‍मकुंडली में किस किस खाने से क्‍या क्‍या देखा जाता है ??

पिछले सारे लेखों में हमने समझा कि एक छोटी सी जन्‍मकुंडली किस प्रकार जातक के जन्‍म के समय आसमान के पूरे 360 डिग्री और उसमें स्थित सभी ग्रहों को स्‍पष्‍ट करती है। एक छोटे से चित्र में इतनी बातों को समाविष्‍ट कर उस व्‍यक्ति के जन्‍म के समय आसमान की पूरी स्थिति को समझने में सफलता प्राप्‍त करना ऋषि मुनियों की दूरदर्शिता ही थी। पर ये तो ज्‍योतिष विज्ञान के लिए भविष्‍यवाणी करते वक्‍त इनपुट लेने जैसा है। जैसा कि वैज्ञानिक दृष्टि वाले समझते हैं , ज्‍योतिष का अंत यहीं पर हैं , बिल्‍कुल गलत है। आसमान के ग्रहों की स्थिति को देखकर जातक के भविष्‍य के बारे में , उसकी आगे की जीवनयात्रा के बारे में , उसके सभी संदर्भों के सुख दुख के बारे में आकलन करना ही ज्‍योतिष का मुख्‍य लक्ष्‍य है , जिसके लिए हमें फलित ज्‍योतिष के नियमों को सीखने की आवश्‍यकता पडती है। नीचे दिए गए चित्र से समझा जा सकता है कि ज्‍योतिष भविष्‍यवाणी करने में किस प्रकार समर्थ हो पाता है ??
जन्‍मकुंडली में जितने भी खाने होते हैं , वे मनुष्‍य के जीवन के एक एक पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। किस खाने में कौन सा नंबर लिखा है और किस खाने में कौन से ग्रह बैठे हैं , इसपर पहले  ध्‍यान देने की कोई आवश्‍यकता नहीं , लग्‍न वाले खाने को पहला और उसके बाद के  खाने की ओर बढते हुए हर खाने को क्रमश: दूसरा , तीसरा , चौथा भाव समझते हुए आगे बढते जाए। आप पाएंगे कि लग्‍नवाले खाने से सटा दाहिने ओर का खाना बारहवां भाव होगा। ये बारहो भाव क्रमश: व्‍यक्तित्‍व , संसाधन , शक्ति , स्‍थायित्‍व , ज्ञान , झंझट , गृहस्‍थी , जीवनशैली , भाग्‍य , सामाजिकता , लाभ और खर्च से संबंधित होते हैं। किसी की जन्‍मकुंडली देखकर उनके इन संदर्भों को जानने के लिए इन भावों को समझते हुए इसमें स्थित अंकों और ग्रहों को देखने की आवश्‍यकता होती है।

विभिन्‍न भावों में लिखे अंक के स्‍वामी ग्रह जातक के उस पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करने वाले होते हैं। जैसे मेष लग्‍नवालों के लिए शरीर और जीवन का स्‍वामी मंगल( क्‍यूंकि मंगल मेष और बृश्चिक राशि का स्‍वामी है) , धन और गृहस्‍थी का स्‍वामी शुक्र( क्‍यूंकि शुक्र वृष और तुला राशि का स्‍वामी है) , भाई और झंझट का स्‍वामी बुध( क्‍यूंकि बुध मिथुन और कन्‍या राशि का स्‍वामी है) , स्‍थायित्‍व का स्‍वामी चंद्रमा( क्‍यूंकि चंद्रमा कर्क राशि का स्‍वामी है) , ज्ञान का स्‍वामी सूर्य( क्‍यूंकि सूर्य सिंह राशि का स्‍वामी है) , भाग्‍य और खर्च का स्‍वामी बृहस्‍पति( क्‍यूंकि बृहस्‍पति धनु और मीन राशि का स्‍वामी है) तथा प्रतिष्‍ठा और लाभ का स्‍वामी शनि( क्‍यूंकि शनि मकर और कुभ राशि का स्‍वामी है) होता है। इसलिए जातक के उन पक्षों की भविष्‍यवाणी करने के लिए मुख्‍यत: इन्‍हीं ग्रहों की शक्ति को देखना आवश्‍यक होता है। चूंकि पूर्वी क्षितिज में परिवर्तन होता रहता है और हर वक्‍त अलग अलग लग्‍न का उदय होता है , इसलिए दूसरे लग्‍नवालों की कुडलियों में सभी संदर्भों को प्रभावित करने वाले ग्रह बदल जाते हैं। इसके अलावे संबंधित भाव में जो ग्रह होते हैं , वे भी उन संदर्भों में खास प्रकार के वातावरण को बनाने में सहायक होते हैं। तो जातक की जन्‍मकुंडली के हिसाब से विभिन्‍न पक्षों का आकलन करने के लिए हमें उस भाव के स्‍वामी ग्रह के अतिरिक्‍त उसमें स्थित ग्रहों को भी ध्‍यान में रखना पडता है।

Friday, 6 August 2010

कुंडली में ग्रहों का स्‍वक्षेत्री होना क्‍या है ??

जैसा कि मैने पहले ही एक आलेख में लिखा है , ज्‍योतिष शास्‍त्र में आसमान के पूरब से पश्चिम की ओर जाती गोल चौडी 360 डिग्री की पट्टी को 30-30 डिग्री के 12 भागों में बांटा गया है और एक एक राशि निकाली गयी है। 30-30 डिग्रियों के रूप में राशि का विभाजन यूं ही नहीं किया गया है , प्राचीन ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में चर्चा है कि इन 30-30 डिग्रियों तक आसमान से परावर्तित होने वाली किरणों का रंग एक जैसा है , हालांकि इसे प्रमाणित कर पाने में अभी या तो हमारा ज्ञान पर्याप्‍त नहीं हैं या फिर हमारे पास वैसे कोई साधन नहीं हैं।

परंपरागत ज्‍योतिष के अनुसार मेष और वृश्चिक राशि लाल रंग परावर्तित करते हैं , बिल्‍कुल वैसा जैसा मंगल ग्रह से परावर्तित होता है। इसी प्रकार वृष और तुला राशि से चमकीला सफेद , जैसा शुक्र ग्रह से परावर्तित होता है। मिथुन और कन्‍या से बुध की तरह हरे रंग का , कर्क से चंद्रमा की तरह दूधिया रंग का , सिंह से सूर्य की तरह लाल रंग परावर्तित होता है। इसी प्रकार धनु और मीन राशि से बृहस्‍पति की तरह पीला रंग और मकर और कुंभ राशि से शनि की तरह गाढा नीले रंग के परावर्तित होते किरणों की चर्चा की गयी है।

इसी आधार पर मेष और वृश्चिक राशि का स्‍वामीत्‍व मंगल को , वृष और तुला राशि का स्‍वामीत्‍व शुक्र को , मिथुन और कर्क राशि का स्‍वामीत्‍व बुध को , सिंह राशि का स्‍वामीत्‍व सूर्य को , धनु और मीन राशि का स्‍वामीत्‍व बृहस्‍पति को तथा मकर और कुंभ राशि का स्‍वामीत्‍व शनि को दिया गया है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इस तथ्‍य के अनुसार भविष्‍यवाणियां करने में कोई खामी नहीं पायी है , इसलिए इसकी प्रामाणिकता पर इसे कोई संदेह नहीं है। इसे तो ताज्‍जुब इस बात का है कि संसाधन विहीनता के मध्‍य हमारे पूर्वजों के अनुसंधान में इतने सारे तथ्‍य किस प्रकार जुड गए ??

यही कारण है कि कुंडली में मेष और वृश्चिक राशि में मंगल के होने से , वृष और तुला राशि में शुक्र के होने से , मिथुन और कन्‍या राशि में बुध के होने से , कर्क राशि में चंद्र के होने से , धनु और मीन राशि में बृहस्‍पति के होने से तथा मकर और कुंभ राशि में शनि के होने से इन ग्रहों को स्‍वक्षेत्री माना जाता है। परंपरागत ज्‍योतिष स्‍वक्षेत्री ग्रहों को बहुत ही महत्‍वपूर्ण मानता है , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार स्‍वक्षेत्री ग्रह भी अपनी गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति के हिसाब से ही अच्‍छा या बुरा फल देते हैं। हां , यह बात अवश्‍य है कि वे अपनी खुद की राशि में होते हैं , इसलिए उसके कमजोर या मजबूत होने से दूसरे पक्षों पर बहुत फर्क नहीं पडता है।  किसी मजबूत ग्रह के भाव में कमजोर ग्रह चले जाते हैं , तो उसका बुरा प्रभाव अधिक विकट होता है।

Wednesday, 4 August 2010

कालसर्प योग की भयावहता पर स्‍वयमेव ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग जाता है!!

इधर हाल के वर्षों में जिस ज्‍योतिषीय योग से लोग सर्वाधिक भयभीत हुआ करते हैं , वह है कालसर्पयोग। कालसर्पयोग ने आमजन में शनि , राहू और केतु से भी अधिक भय पैदा किया है। आसमान में राहू और केतु की स्थिति हमेशा आमने सामने यानि 180 डिग्री पर होती है। जब सभी ग्रह इसके मध्‍य आ जाते हैं, तो उस स्थिति में बननेवाली कुंडली में कालसर्पयोग माना जाता है। वैसे तो 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' राहू और केतु के अस्तित्‍व को नहीं स्‍वीकारता , पर इस नियम के तहत् किसी भी कुंडली को देखने पर जब सारे ग्रह एक ओर दिखाई दें तो उस कुंडली में कालसर्पयोग माना जा सकता है। यहां तक कि नियमानुसार चंद्रमा यदि 180 डिग्री के अंदर न होकर उससे बाहर भी हो , तो भी कुंडली में काल सर्पयोग माना जाता है।

अभी आसमान में केतु मिथुन राशि में और राहू धनु राशि में चल रहा है। इसलिए इनके मध्‍य और सारे ग्रह भले ही आ जाएं , पर सौरमंडल के दूरस्‍थ ग्रह शनि और बृहस्‍पति में से दोनो नहीं आ सकते , क्‍यूंकि अभी शनि कन्‍या राशि में और बृहस्‍पति मीन राशि में यानि ये दोनो भी आमने सामने चल रहे हैं, इसलिए एक ओर आ ही नहीं सकते। सौरमंडल में सूर्य के निकट स्थित ग्रह बुध , मंगल , शुक्र आदि तो हमेशा साथ साथ होते ही हैं , इसलिए ये राहू और केतु के एक ओर हो सकते हैं , पर शनि और बृहस्‍पति के एक दूसरे के विपरीत होने के कारण अभी यानि 2010 में जन्‍म लेनेवाले किसी भी बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में कालसर्पयोग नहीं बन सकता। इससे पहले भी 2007 , 2008 , 2009 में जन्‍म लेनेवाले किसी बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में भी यह योग नहीं बना , क्‍यूंकि यहां भी बृहस्‍पति और शनि में से दोनो ग्रह राहू और केतु के मध्‍य नहीं थे।

यदि चार पाचं वर्ष पूर्व चले जाएं , जब बृहस्‍पति वृश्चिक या तुला राशि में था और शनि कर्क में , और दोनो ग्रह राहू और केतु क्रमश: तुला और मेष में , तो ये दोनो ग्रह वर्षभर एक ओर ही होते थे। वर्ष में छह महीने इनके मध्‍य ही अन्‍य सभी ग्रहों को भी होना ही था। हां , यदि चंद्रमा को छोडकर कालसर्पयोग की परिभाषा रची जाए , तो भले ही छह महीनों में से पंद्रह दिनों तक चंद्रमा के दूसरी ओर होने से कालसर्पयोग न बन पाए , लेकिन बृहस्‍पति और शनि जिस वर्ष राहू और केतु के मध्‍य फंसे हों , उस वर्ष चंदमा को छोड देने से छह महीने तक लगातार जन्‍म लेने वाले बच्‍चों की जन्‍मकुंडली में कालसर्पयोग होगा। यदि चंद्रमा पर भी ध्‍यान दिया जाए तो भले ही छह महीनों तक पंद्रह दिनों तक जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे कालसर्पयोग में जन्‍म नहीं लेंगे। लेकिन अगले पंद्रह दिनों तक जनम लेनेवाले सारे बच्‍चे पुन: इसी योग में पडेंगे। हां , वर्ष के छह महीनों में जन्‍म लेनेवालों की कुंडली में यह योग नहीं देखा जा सकता है , क्‍यूंकि बृहस्‍पति और शनि तो सौरमंडल में एक ही ओर होते हैं , जबकि सूर्य , बुध , शुक्र और मंगल वर्षभर में लगभग पूरे 360 डिग्री का चककर लगा लेते हैं।

ऐसा किसी एक वर्ष में नहीं  , लगातार चार वर्षों तक जबतक बृहस्‍पति और शनि दोनो आसमान के एक ओर न हो जाएं , आसमान में छह महीनों तक ऐसी स्थिति बनती ही रहती है , जिस समय जन्‍मलेनेवालों की कुंडली में कालसर्प योग बन सके। बस एक चंद्रमा की स्थिति अंदर और बाहर होती रहती है। इसका अर्थ यह है कि किसी खास वर्ष में या लगातार कई वर्षों तक जन्‍म लेनेवाले 50 प्रतिशत बच्‍चे या कम से कम 25 प्रतिशत बच्‍चे की कुंडली में संपूर्ण कालसर्प योग हो सकता है। जबकि ऐसा नहीं है कि खास वर्षों में खास समयांतराल में सिर्फ अमीर या गरीब घर में या अमीर या गरीब देश में ही बच्‍चे जन्‍म लेते हैं। दुनिया में असामान्‍य परिस्थिति में जीवनयापन करने वाले का प्रतिशत बहुत सामान्‍य होता है। अब जब यह योग इतना सामान्‍य है तो इसकी भयावहता पर स्‍वयमेव ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग जाता है।